जासूसी उपन्यासों की कोई चर्चा शायद जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा के बिना पूरी नहीं हो सकती. दिल्ली क्लॉथ मिल में मजदूरी करने वाले ओम प्रकाश शर्मा लाल सलाम करके मिल में मजदूरों की लड़ाई भी लड़ते थे. जनवादी विचारों को मानने वाला यह जासूसी लेखक बड़ी शिद्दत से इस बात में यकीन करता था कि ऐसे साहित्य की निरंतर रचना होनी चाहिए जिसकी कीमत कम हो तथा समाज के निचले तबके के मनोरंजन का उसमें पूरा ध्यान रखा गया हो. शायद इसी संकल्प के साथ वे जीवन भर ‘सस्ता’ साहित्य लिखते रहे लेकिन अपने नाम के आगे सदा जनप्रिय लिखते रहे. इसीलिए अपने उपन्यासों में झीना ही सही लेकिन नैतिकता का एक आवरण बनाते रहे. मजदूर वर्ग का कि आवाज़ उनके उपन्यासों में बुलंद बनकर उभरती थी. सर्वहारा वर्ग के प्रति उनके लेखन में गहरी सहानुभूति का एक भाव निरंतर बना रहा.
करीब ४५० उपन्यास लिखने वाले इस लेखक की अगाध श्रद्धा शरतचंद्र के उपन्यासों में थी. हिंदी के जासूसी लेखन धारा को जगत, गोपाली जैसे चरित्र देने वाले इस लेखक ने आरम्भ में इतिहास के अभिशप्त और उपेक्षित पात्रों की कथा लिखी थी. इनका एक उपन्यास ‘सांझ का सूरज’ है जो आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के जीवन पर आधारित है. इनके सच्चे शैदाई तो उसे साहित्यिक उपन्यास का दर्ज़ा देते हैं. इसी तरह जनकवि नजीर अकबराबादी का औपन्यासिक जीवन चरित लिखने का श्रेय भी इसी जासूसी उपन्यासकार को जाता है. ‘दूसरा ताजमहल’ नामक उस उपन्यास को तो मैंने हिंदी के बड़े बड़े लेखकों को याद करते देखा है.
जिन दिनों ओमप्रकाश शर्मा ने हिंदी में जासूसी उपन्यास लिखना आरम्भ किया उन दिनों उर्दू जासूसी लेखन के सरताज इब्ने सफी के उपन्यासों का जादू हिंदी के पाठकों के ऊपर भी चढा हुआ था. उनके उपन्यासों के अनुवाद हिंदी में धड़ाधड़ बिकते थे. मकबूलियत में में वे भले इब्ने सफी का मुकाबला नहीं कर पाए हों मगर इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी के अपने ऐसे पात्र तैयार किये जिनको बाद में अनेक लेखकों ने आजमाया. शरतचंद्र के अलावा उनके दूसरे प्रिय लेखक अमृतलाल नागर थे और उन्हीं की तरह उनके उपन्यासों की वर्णनात्मकता ऐसी होती थी कि वे सचमुच में जनप्रिय हो गए. दिल्ली में २५ रुपये में एक उपन्यास लिखने वाले ओमप्रकाश शर्मा बाद में एक उपन्यास के ३०० रुपये मिलने लगे. बाद में मेरठ के लुगदी साहित्य बाजार में अपने उपन्यासों की उनको इतनी कीमत मिलने लगी कि दिल्ली के पहाड़ी धीरज से उठकर वे मेरठ के हवेलीदार बन गये. एक सफल और संपन्न लेखक.
जिन दिनों ओमप्रकाश शर्मा ने जासूसी लेखन शुरू किया उन दिनों हिंदी के जासूसी उपन्यासकारों के ऊपर यह आरोप लगाया जाता था कि वे अंग्रेजी के थ्रिलर्स की नक़ल कर रहे हैं. अनेक लेखक जेम्स हेडली चेज़ की नक़ल में लिख भी रहे थे. लेकिन इन्होंने अपना रास्ता अलग बनाया. उनका तो स्पष्ट मानना था कि अंग्रेजी के उपन्यासों में सस्पेंस अधिक होता है जबकि हमारे पाठक रोमांच को अधिक पसंद करते हैं. इसके लिए उन्होंने चन्द्रकांता की उस शैली को अपनाया जिसमें उत्सुकता और रोचकता की पारंपरिक किस्सागोई का ज़बरदस्त मेल था. ओमप्रकाश शर्मा यह मानते थे कि उत्सुकता के सहारे रोचक ढंग से पाठकों को कथा में आगे ले जाया जाए तो ही किसी उपन्यास को सफल मानना चाहिए. विदेशी फार्मूला लेखन का उन्होंने ऐसा देशी काट रखा कि आनेवाले सालों में वही हिंदी में वही सबसे बड़ा फार्मूला बन गया. कहते हैं कि उनका ब्रांड इतना चल गया कि उनके नाम पर नकली उपन्यास लिखे जाने लगे. उनके नाम पर इतने जाली उपन्यास लिखे गए जितने शायद ही किसी लेखक के नाम पर लिखे गए हों.
हर महीने दो उपन्यास लिखने वाले इस लेखक की साहित्य के बारे में धारणा बड़ी स्पष्ट थी. वे मानते थे कि अपने समय में जो पाठकों के बीच सही ढंग से अपना स्थान बना पाए वही वास्तव में लेखक होता है. वे स्वयं इस बात को शायद अच्छी तरह जानते थे कि वे कोई कालजयी लेखन नहीं कर रहे हैं इसलिए कभी आलोचनाओं की परवाह भी नहीं करते थे. वे पढ़े-लिखे खास नहीं थे लेकिन समाज पर उनकी पकड़ ज़बरदस्त थी. उन्होंने जासूसी उपन्यास की दुनिया में ऐसे प्रयोग किये जिनकी ओर गंभीर पाठकों का कम ही ध्यान गया. उन्होंने रामायण-महाभारत के चरित्रों को आधार बनाकर भी जासूसी उपन्यास लिखे. उनके उपन्यासों में यथार्थ कल्पना के ज़ोर से जीवंत हो उठता था. उनके बारे में एक अन्य जासूसी उपन्यासकार वेद प्रकाश कम्बोज ने लिखा है कि वे किसी भी घटना को आधार बनाकर कहानी लिख सकते थे. यादवेन्द्र शर्मा चंद्र ने उनके ऊपर लिखे एक संस्मरण में एक घटना का ज़िक्र किया है कि एक बार उन्होंने कटी हुई उंगलियां देखी और उसके ऊपर ही उपन्यास लिख डाला. उनके प्रकाशक उपन्यास के आकर्षक नामों की घोषणा पहले कर दिया करते थे और ओमप्रकाश शर्मा उसी शीर्षक के अनुरूप उपन्यास लिख दिया करते थे.
वे कोई महान उपन्यास लिखने के कायल नहीं थे. उनका फंडा बड़ा साफ़ था- ऐसा उपन्यास लिखो जिसमें आम जन के हित की भावना हो. बुरे की हार का सन्देश हो और पढ़ने के बाद उस हालत पर थोड़ी देर ही पाठक ठहरकर सोचे. अपनी इस कसौटी पर वे हमेशा खरा उतरने की कोशिश करते थे. बाद में वे मेरठ से उनके उपन्यासों के ५०-५० हज़ार के संस्करण निकलने लगे और वे स्टार लेखक बन गए. लेकिन लोकप्रियता के लिए अपने सिद्धांत से उन्होंने शायद ही कभी समझौता किया.
जिन दिनों वे जासूसी उपन्यास लिख रहे थे उन दिनों रोमांटिक लेखन की धारा का ज़ोर था. गुलशन नंदा की लोकप्रियता अपने चरम पर थी. गुलशन नंदा के उपन्यासों पर एक से एक फ़िल्में बनी लेकिन ओमप्रकाश शर्मा ने फिल्मों में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. वे फिल्म माध्यम से इसलिए चिढे रहते थे क्योंकि उसमें लेखक की स्वतंत्रता नहीं होती है. हालाँकि बासु चटर्जी की फिल्म ‘चमेली की शादी’ उन्हीं के उपन्यास पर बनी थी. अनिल कपूर और अमृता सिंह की वह फिल्म ज़बरदस्त कॉमेडी है. गली-मोहल्लों वाली कहानी. उनके पाठकों का तो कहना है कि उनके मरने के बाद उनके उपन्यास ‘अपने देश में अजनबी’ को आधार बनाकर एक बड़ी फिल्म बनी थी. फिल्म का नाम था स्वदेश तथा उसमें शाहरुख खान ने अभिनय किया था. लेकिन फिल्म बनाने वाले ने उनको क्रेडिट नहीं दी.
उनकी अपने पाठकों पर पकड़ थी तथा उनके ऊपर अगाध विश्वास भी. इसीलिए शायद एक बार जब उनसे यादवेन्द्र शर्मा चंद्र ने पूछा था कि नए-नए लेखक आ रहे हैं इससे उनको कहीं यह डर तो नहीं लगता कि कही उनका ब्रांड ना पिट जाए. उनका जवाब था- किसी समय चांदनी चौक में घंटेवाला नामक एक मिठाई वाला था, अब कितने हैं. हल्दीराम की दुकान पर भीड़ लगी रहती है. इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे दुकानदारों की मिठाई नहीं बिकती? माल के अनुसार बिक्री होती है. हम लोग महान साहित्यकार नहीं हैं. लोकप्रिय साहित्यकार हैं. जन-जन के प्रिय साहित्यकार हैं….जो जासूसी लेखक अभी उभरे हैं, प्राय: वे मेरे शिष्य हैं….एक बात और कहूंगा, आज गुलशन नंदा की लोकप्रिय लेखकों में तूती बोलती है पर यह भी सच है कि प्यारेलाल आवारा, रानू, गोविंद सिंह, दत्त भारती भी बिकते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि ट्रेड नाम जैसे कर्नल रणजीत, राजवंश, मनोज आदि भी खूब बिकते हैं.
इसी आत्मविश्वास के साथ करीब ३० साल तक वे लोकप्रिय उपन्यासों के पाठकों के जनप्रिय बने रहे.

