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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    कलरव में सुबह चुप है

    By February 26, 201113 Comments2 Mins Read

    नंदकिशोर आचार्य ऐसे कवि हैं जो शोर-शराबे से दूर रहकर साधना करने में विश्वास करते हैं. अनेक विधाओं में सिद्धहस्त आचार्य जी मूलतः कवि हैं. अभी हाल में ही वाणी प्रकाशन से उनका नया संग्रह आया है ‘गाना चाहता पतझड़’ कविताएँ. उसकी कुछ कविताएं- जानकी पुल.





    १.
    उसकी नहीं हुई जो
    हर कोई परीशाँ है
    दुनिया के हाल पर
    पर दुनिया है कि मगन है
    अपने में
    कोई फर्क नहीं पड़ता उसे
    कुछ भी कहीं भी हो–
    किसी के—
    खुद उसके भी साथ
    और ईश्वर है कि रो रहा है
    अपनी उस दुनिया पर
    उसकी भी नहीं हुई जो.
    २.
    कविता अमृत है
    दाग जो संजो रखा है
    दिल में चांद ने अपने
    दर्द किसका दिया है
    यह
    दर्द क्या पारस है कोई
    परस से जिसके
    बदल कर आग सूरज की
    बरसती है
    अमी हो कर.
    कविता अमृत है
    इसीलिए क्या?
    ३.
    कहीं गुम है
    रात भर गाता रहा आकाश
    ख़ामोशी
    कलरव में सुबह चुप है
    सुन रहा था तन्मय
    अँधेरा जो
    धूप में कहीं गुम है.
    ४.
    कितने अलग रंग हैं
    प्यार सुनना
    चाहती हो तुम
    कहना नहीं
    प्यार सहना
    चाहती हो तुम
    बहना नहीं
    प्यार बोना
    चाहती हो तुम
    खिलना नहीं
    कितने अलग रंग हैं
    प्यार होने के
    तुम्हारे?
    ५.
    सुख भी मार देता है
    दुःख ही नहीं मारता
    केवल
    सुख भी मार देता है
    अच्छा है, देती रहो
    सुख में मिला कर
    कुछ दुःख
    सह सकूँ जिस से मैं
    तुम्हारे प्यार की
    यह चुप.
    ६.
    मुंदा रहता है जब तक
    मुंदा रहता है
    जब तक आँखों में
    सच रहता है सपना
    निकलता है जब
    सच होने को
    बह जाता है जल हो कर
    जल कर सूख जाता हुआ.
    ७.
    देवदार यह
    किसका इंतज़ार है इसे-
    बाँहें फैलाये
    देवदार यह
    अपने में डूबा है जो.
    ८.
    वक्त
    सुबह रात को याद करना है
    रात की प्रतीक्षा है
    दिन—
    रात तुम्हारा इंतज़ार है बस
    इस तरह
    होता हूँ मैं वक्त
    गर्दिश हो जिसकी
    तुम.
    ९.
    रह गया होकर कहानी
    कविता होना था मुझे
    रह गया होकर
    कहानी
    न कुछ हो पाने की
    मेरा सपना
    होना था जिसे
    रह गई होकर रात
    नींद के उखड़ जाने की
    उम्र पूरी चुकानी
    एक पल मुस्कराने की.
    नंदकिशोर आचार्य का चित्र: ओम थानवी (प्रतिलिपि से साभार)

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