Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    प्रेम का आसरा अटारी पर बैठे कबूतर थे

    By September 29, 201118 Comments8 Mins Read

    अभी हाल में ही युवा कवयित्री विपिन चौधरी को डॉ अंजना सहजवाला कविता सम्मान मिला है. जानकी पुल की ओर से उनको बधाई और प्रस्तुत हैं उनकी कुछ नई कविताएँ- जानकी पुल.
    खोज अर्थात वास्कोडिगामा  
    महज़ काली मिर्च की खुश्बु ही
    किसी लम्बी भटकन का कारण नहीं हो सकती
    एक टीस के मातहत ही
    जोखिम उठाने का सामान बंध सकता है
    एक राह दूसरी राह का दामन थामती है
    जब कोई दो चार काम की चीज़ें बगल में बाँध कर
    अनजानी राह पर अकेला चल निकलता है
    बिना किसी नैन- नक्श के
    सिरे के बल पर
    मिट्टी, जल और ज़मीन पर निशान बनाता हुआ
    कच्ची पगडंडीयाँ खोजता-बनाता.
    ऐसे सिरफिरे को पुर्तगाल में वास्कोडिगामा और
    किसी दूसरे देश में दशरथ मांझी का नाम दिया गया  है 
    इधर एक हम रहे
    जिन्हे सुई तक खोजना भारी पड़ा
    एकांत का आडम्बरहीन सुख हमें कुछ खोजने से रोकता रहा
    इन दो पांवो ने हमें अपने से कभी दूर नहीं होने दिया
    एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब हम
    अपने करीब आये हों और इससे उलट कभी अपने से दूर गए हों
    हम कबीर की उस राह के नजदीक थे जो सीधे मन से हो कर राह बनाती थी
    उस पर भी एक प्रेम ने जीते-जी कई मुश्किल पैदा कर दी
    एक राह छोड़ कर बाकि सभी राह बंद थी यहाँ हमारे लिये
    हमारा बागी भी इसी एकलौती राह में धूनी रमाता चला गया
    हाल यह है कि हमारा नाता केवल हमीं से रहा
    ‘एकला चलो‘ का सटीक ज्ञान भीतर उतारने वाले अकेले तुम्ही निकले जिसने
    एक गहरी साँस ले,
    दूरियों को पांवो से नापने का प्रण लिया
    तब प्रार्थनाओ की कंपकंपाती लौ और
    कब्रिस्तानो का नीरव आशीर्वाद तुम्हारे पेटी से सिमट गया होगा      
    धुँआधार-नाविक-खिलाड़ी समुद्र के बड़े-बडे पत्थरों से टकरा कर राह भटकते रहे 
    पर तुमने व्यापार के नाम पर लगभग लगभग
    कई नदी, नाले और टीले पार किये
    एक दिन आ पहुंचे मछुआरो, नटों की अजातशत्रु धरती के पश्चिमी तट पर 
    तब इस  चौरस  भूखंड ने पहली बार भारत के नाम से गर्भ-धारण किया 
    इस नए देश ने अपनी पहचान पर ऊँची
    अंगडाई ली
    इसी सुगबुगाती गंध की तुम्हे तलाश थी
    जो पसीने से हमेशा तर रहती हो
    और जिसकी आँखों में हमेशा नमी विराजती हो
    जिसका स्मित-विस्तार चारों दिशाओं में फैला हो
    तुमने इस देश की खुशबूदार सुबह, मसालेदार शाम और सौंधी रातों से संसार भर मे परिचय करवाया 
    यह तुम्हारी मेहरबानी ही थी कि
    हम घोर आलसी जीवों को 
    बैठे-बिठाये अपने पांवों के नीचे जमीन मिल गयी 
    यह जुदा बात है कि इस धरा के आदर में ठीक से नतमस्तक होने का सलीका 
    हम आज तक  भी नहीं सीख पाए है.

    शहजादी (१६१४-१६८१) का चितकबरा प्रेम 
    किस्से- कहानियों  के पिटारे में बंद धूसर वक़्त की एक  कब्र
    कब्र में बैचैन रूह 
    और शाम का जम्हाई लेता उनींदा मौसम  
    इन्ही पलों के दरमियाँ इतिहास का सीना चौड़ा होते- होते रह गया
    अचानक ही जब एक शहजादी की बैचेन रूह ने दाईं करवट ली
    दौलतमंद, मगर उदासी से लबरेज़ शहजादी
    उम्र का महकता हिस्सा अपने बीमार शहंशाह पिता की तीमारदारी में अर्पित करती शहजादी 
    महल की बारीक झिर्रीयों से बाहर अपने अरमानो के सलमे-सितारे जडित सेहरे को ताकती शहजादी 
    प्रेम में पगी अपनी आत्मा के तारों से किसी के अंधेरे शामियाने को जगमगाती शहजादी  
    दुनिया के प्रेम-विज्ञानी भी प्रेम में ज्यादा छूट नहीं दे सके
    उदार होने से पहले नक्सली बन हथियार उठाने से वे कभी बाज नहीं आये
    प्रेम  की अंतिम गति दुनियादारी के बोझ तले दफ़न होने की रही  है
    यही कारण रहा कि शहजादी का प्रेम भी वर्जित फल सा अनचखा ही रह गया  
    कुछ मामलो में समय और समाज अलग-थलग पड़ जाते हैं,
    पर प्रेम के मामले में समय और समाज दोनों ने एक साथ अपने पाँव जोड़े 
    इन दोनों का चलन विज्ञान के हिसाब से चलने का रहा और 
    विज्ञान ने  सदा ठोस और तरल चीजों का आदर करना सिखाया 
    प्रेम का मामला दूसरा था
    न ठोस न तरल
    प्रेम की सरंचना वाष्पीकरण की घेरदार प्रक्रिया के नज़दीक ठहरी  
    पहले तरल फिर वाष्प फिर तरल फिर वाष्प
    आलिशान महल के भीतर बीमार शहंशाह पिता का वायदा था और 
    बाहर धड़कती-सांस लेती हुई शहजादी की  चितकबरी दुनिया 
    दोनों मे दूरी जरुरत से कुछ जायदा ही थी    
    सो किसी साँझा रणनीति की सम्भावना लुप्तप्राय हो चली  
    जब कभी महल के इर्द-गिर्द घूमता हुआ प्रेम गुनगुनाता तो
    पिता के पलंग के नज़दीक बैठी शहजादी भाग कर कुरान की शरण लेती
    कुछ पल सुकून के बाद
    प्रेम फिर छोटे-छोटे शब्द बोलता, बंद पंखो की  गौरया की तरह   
    हैरानी नहीं कि प्रेम और शहजादी 
    दोनों की आँखों में नमी का स्थाई डेरा ताउम्र बसा रहा  
    प्रेम का आसरा अटारी पर बैठे कबूतर थे 
    जो दो दिलो के आपसी पैगाम बांचा करते  
    यूँ तो जहीन बेगम ने साहिबाबाद बाग़ और चांदनी चौक का खूबसूरत नक्शा ईजाद किया था
    पर मन को मनाने की चीज़े दूसरी थी 
    कविता, चित्रकारी और नन्हें बच्चों ( जिन्हें शहजादी  कविता लिखना सिखाती थी} ने बिखरती शहजादी को संभाले रखा
    अक्सर शाम को यादों की चौसर बिछती
    और शहजादी अपनी जमा-पूंजी  हारती जाती 
    वायदे अक्सर ही कठोर हुआ करते हैं
    और इस बार एक पिता का बेटी से वायदा था
    महल की चमक पर आंच न आने देने का   
    रुखसत होते हुए भी पिता अपना हक जताने से नहीं चुके  
    यह बिना हलाल किये बलि दिये जाने का मामला था
    होना कुछ भी नहीं था और हुआ कुछ भी नहीं
    समय ने शहजादी को बूढ़ा बना दिया और प्रेम को जवान
    जब एक बीमार और बूढ़ी शहजादी महल में अकेली रह जाती है
    तब उसकी कहानी कविता मेरूपांतरित होने को बाध्य होती है
    फिर जब एक दिन कविता का दाना-पानी भी ख़तम हो जाता है तो
    वह रूह मे ढल जाती है और
    रूहें अक्सर बेचैन ही हुआ करती हैं
    इधर भटकते हुये  प्रेम को कहीं ठिकाना नहीं मिला  
    तो वह भी बरसों-बरस कब्र की सीली ज़मीन के भीतर 
    बैठ अपना हिसाब- किताब  तय करता रहा 
    टनों मिट्टी के बोझ और
    मौसमों की पुरज़ोर आवाजाही के बावजूद
    प्रेम और रूह का तीखापन बरक़रार रहा 
    पर मृतआत्माओं की भी  सीमा हुआ करती है
    और यह सीमा एक करवट पर ख़त्म हो जाती  है 
    तब प्रेम में अटूट आस्था रखने वालों को किसी  रोज़
    शहजादी की कब्र पर धूमिल सा लिखा हुआ कुछ संज्ञान में आता है 
    “प्यार तब भी गुनाह था
    प्यार इस घड़ी  भी गुनाह है
    प्यार तब भी स्त्रियों की बपौती थी
    प्यार आज भी केवल स्त्रियों की निजी सम्पति है‘.

    प्रथम  पुरूष 
    तमाम ठोकरे प्रथम  पुरूष के आवृत में रहकर खाने के बावजूद
    इससे बाहर निकलने की ज़हमत
    हमने कभी नहीं ऊठाई
    निपट नौसिखये की तरह  प्रेम मे डूबे
    रिश्तों की नुकीले शाखाओं से घायल हुये
    सब कुछ दरीचे से देखा, परखा पर इसकी चौहद्दी से एक बार भी  ओझल नहीं हुये
    घोर स्वार्थी बन अपने पर ही नज़रे जमायी रखी
    अपने आप को मर्यादा पुरूषोतम बनने का उदघोष यहीं से जारी किया
    प्रथम पुरूष की इस बानी में कुछ बेवकूफ लोगों को मोहित करने में कामयाब भी हुए 
    दोस्त बनकर कैसे पीढ पर वार किया जाता है
    बाहर- भीतर, भीतर- बाहर आने जाने में
    कितनी मुस्तैदी रखनी होती है
    इसी में रह कर जाना
    कई खानों मे अपना बंटवारा किस बढ़िया कायदे से  करना है  
    कब दुबके रहना
    कब मक्मारी दिखानी
    कब अपने दाँत और नाखून तेज़ करने हैं
    कब साधु का बाना ओढ घर के अँधेरे कोने में शरण लेनी है
    एक साथ  डाकूपन की खुजली और ओमशांति के गुरु-मंत्र का जाप 
    किस होशियारी से करना है 
    घंटा और घडियाल दोनों को कब और किसके कानों के पर्दे पर दस्तक की तरह देना  है
    कब बेहद मामूली बन कर सभा में आना है
    इतना लम्बा-चौडा गणित प्रथम पुरुष के सांचे में रहकर की अर्जित किया
    यहाँ प्रथम पुरुष के आवरण मे कई सुविधायें एक साथ भोगने का कुटिल सुख था इसीलिये
    कई नेक आत्माओं के समझाने के बावजूद
    अंतत हमने प्रथम पुरूष के घेरे में ही जीना स्वीकार किया. 

    एक वक़्त से दूसरे वक़्त
    मरुस्थल से दोस्ती के वक़्त से ही
    हवा पानी की तरफ से मेरे हाथ तंग हैं
    लगता है इस बार बसंत भी मेरी ओर से आँख फेर लेगा
    तब मेरे खाते में केवल ढलती शामें ही बची रहेंगी
    मैं, मरुस्थल और हमारी बेबस थकान
    एक ही पंक्ति मे खडे रहेंगे 
    फिर एक लम्बी ऊब से दूसरी उब के बीच
    समय सारिणी के अनुशासन को छलनी करते हुए
    मै भूमध्य रेखा पर नज़र डालूँगी
    सौर मंडल के ताम- झाम को नजदीक से समझने की कोशिश में   <

    Related Posts

    Драгон Мани: Мифический зверь или реальный выигрыш?

    June 21, 2026

    test

    June 21, 2026

    Драгон Мани: Мифический зверь или реальный шанс на выигрыш?

    June 21, 2026
    View 18 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Драгон Мани: Мифический зверь или реальный выигрыш?
    • test
    • Драгон Мани: Мифический зверь или реальный шанс на выигрыш?
    • Dragon Money Сайт: Всё, что нужно знать о платформе
    • Драгон Мани Игры: Мифы и Реальность

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.