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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    वे लोग, वह युग, वह दुनिया कहाँ चली गई?

    By February 5, 201111 Comments9 Mins Read

    आज हिंदी के उपेक्षित कवि जानकीवल्लभ शास्त्री ९५ साल के हो गए. इस अवसर पर उनके शतायु होने की कामना के साथ प्रस्तुत है यह संस्मरणात्मक लेख जिसे कवयित्री रश्मिरेखाजी ने लिखा है- जानकी पुल.

    हमारा मुज़फ्फरपुर शहर मीठी लीचियों के साथ-साथ आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के लिए भी जाना जाता है. शास्त्रीजी की तुलना उनके समय के किसी दूसरे रचनाकार से नहीं की जा सकती. वे अपने तरह के अकेले रचनाकार हैं और उनका योगदान भी सबसे अलग है. साहित्य की शायद ही कोई विधा होगी जो उनके खास अंदाज़ में न दमकी हो. सच तो यह है आधुनिक काल में ‘कविर्मनीषी’ शब्द को उनसे जुड़कर अपने खोये हुए अर्थ मिलते हैं. वेद-वेदान्त का विधिवत अध्ययन करने के बाद भी वे कहते हैं, ‘न कभी मैंने मंत्र जपा, न विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की न कुल की परंपरा के अनुकूल किसी संप्रदाय की दीक्षा ली. शायद मैं अपने कुल का पहला धर्म-विप्लवी हूँ.’ इसी तरह जीवन को शास्त्र से अधिक मूल्यवान बताते हुए वे इस बात पर जोर देते हैं कि जीवन को गढ़ने के लिए शास्त्रों का निर्माण किया गया है, शास्त्रों को गढ़ने के लिए जीवन नहीं बनाया गया है.
    भारत की सांस्कृतिक विरासत शास्त्रीजी की रचना के साथ-साथ व्यक्तित्व में भी बोलती है. उनका पूरा जीवन, पूरा व्यक्तित्व कवित्वमय है. उनसे मिलना, उनसे बातें करना न केवल साहित्य और संस्कृति के समृद्ध दौर के निकट से गुज़रना है, बल्कि जीवंत इतिहास से संवाद करना भी है. उनकी जिंदगी की कहानी भले अनकही रही हो, पर उनकी रचनाओं की बुनावट में न केवल मनुष्य, बल्कि पशु-पक्षियों, प्रकृति और वनस्पतियों से भरा संसार और उससे आत्मीय संवाद है. उन्होंने खुद को किनारे का गायक कहा है, और धारा में बहते जाने से इनकार किया है- यही विशेषता उनको औरों से अलग कर देती है.
    किसी ऋषि आश्रम सा है ‘निराला निकेतन’(मुजफ्फरपुर में जानकी वल्लभ शास्त्री का आवास), जो महाकवि निराला के साथ-साथ शास्त्रीजी की जीवन-शैली के निरालेपन को भी व्यक्त करता है. इसमें प्रवेश करते ही आपको गायों का समूह नज़र आएगा, तो दूसरी ओर मुक्त विचरण करते कुत्ते और कुछ बिल्लियाँ. एक किनारे शास्त्रीजी द्वारा स्थापित मंदिर है, तो सामने माँ की स्मृति में बना अनुपमा कला मंच, जिस पर न जाने कितनी प्रतिभाएं पल्लवित और पुष्पित हुईं. कला मंच के पीछे गाय और संधों के नाम पर अंकित संगमरमर की समाधियां. बहुत सारे पेड़ों, पौधों, फूलों और तितलियों के बीच बरगद का विशाल वृक्ष जो न जाने कितने पक्षियों के नीद को संभाले खड़ा है. उनके पाठकों को शायद ही पता हो कि वे कभी ‘इप्टा’ से भी जुड़े थे.
    शास्त्रीजी जहाँ बैठते हैं उसके ठीक सामने एक छोटा-सा मंदिर है- जिसमें उनके पिता की मूर्ति स्थापित है. ऐसा लगता है पिता-पुत्र आमने सामने बैठे हों. बिना पिता को भोग लगाये वे अन्न की थाली ग्रहण नहीं करते हैं. पिता के प्रति ऐसी आस्था और ऐसा स्नेह कहीं और मिलना दुर्लभ है. उनके ठीक पीछे नीम का पेड़ है, एक बार उस पर करेले की लतर चढ़ गई थी. वे आने-जाने वाले को दिखाकर कहा करते थे- ‘यह मेरा प्रतीक है’. ग़ालिब की तरह अपना मजाक उड़ाने की क्षमता बहुत कम रचनाकारों में होती है. शास्त्रीजी के व्यक्तित्व का यह खास पहलू है. पंचानवे साल की उम्र में भी एक तपस्वी-सा कठिन जीवन जीते शास्त्रीजी को देखकर ही जाना जा सकता है कि जीवन की कठिन रागिनी को कोमल सुर में गाने की महारत उन्हें ऐसे ही हासिल नहीं हुई है. पाँव की हड्डी टूट जाने के चलते बरसों से चलने-फिरने में अशक्त हैं और अब करीब २ साल से पत्नी छाया देवी की बीमारी ने तो पूरे निराला-निकेतन परिवार को ही सेवकों की देखभाल पर निर्भर कर दिया है. ऐसे में एक बार खीझकर वे बुदबुदा रहे थे- ‘हे ईश्वर, मैं इन कुछ मनुष्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाता हूँ तुम सृष्टि के सारे मनुष्यों को कैसे बर्दाश्त करते होगे. तुम सचमुच महान हो.’
    शास्त्रीजी ने जब मुजफ्फरपुर में रहने का निर्णय लिया तो यह शहर निराला से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी और आधुनिक समय के अनेक नामचीन रचनाकारों का एक एक साहित्यिक पड़ाव हो गया. डॉ नामवर सिंह को साष्टांग दंडवत कर निराला की एक कविता-पंक्ति का अर्थ पूछते देखना और त्रिलोचन के दो दिनों के आत्मीय प्रवास के दौरान अनुपमा कला मंच पर उनके साथ काव्य-पाठ करना हमारे अनमोल अनुभवों में शामिल है. निराला निकेतन परिसर में शास्त्रीजी की लाइब्रेरी भी है, जिसमें पृथ्वीराज कपूर दो दिन तक ठहरे थे. शास्त्रीजी बताते हैं कि उनके रहने की व्यवस्था दूसरी जगह थी पर उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि ‘कवि, जब तुम यहाँ रह सकते हो तो मैं क्यों नहीं?’ कहते हर वे भावुक हो जाते हैं.
    जैसी महत्वपूर्ण और सार्थक निराला जयन्ती यहाँ मनाई जाती है वैसी कहीं और संभव नहीं है. सरस्वती के साथ निराला की तस्वीर की अर्चना के बाद वे निराला से जुड़े अनेक संस्मरण सुनाते हैं और उनकी कविताओं की बारीकियों पर चर्चा करते हैं. इसके बाद निराला के गीत ठीक उसी तरह सुनाते हैं जिस तरह निराला गाया करते थे- ठीक उसी मुद्रा, उसी सुर-ताल और हाथों की थाप के साथ.
    उम्र के इस  पड़ाव में भी शास्त्रीजी की स्मृतियाँ पूरी तरह जीवंत हैं. यह कहते हुए वे भाव-विह्वल हो जाते हैं कि ‘निराला मुझसे मिलने बनारस के एक छात्रावास में आये तब मैं कविता का ककहरा सीख रहा था. जबकि होना यह चाहिए था कि उनसे मिलने मैं जाता.’ निराला की स्मृतियों में डूबते हुए वे कहते हैं कि सुभद्रा कुमारी चौहान के कहने पर मैंने निराला की कविता ‘वर दे वीणावादिनी’ भीमपलासी में गाकर सुनाया. फिर बच्चन और दिनकर के काव्यपाठ हुए. निरालाजी के कहने पर मैंने अपना गीत ‘किसने बांसुरी बजाई’ राग केदार में सुनाया. निरालाजी इतने प्रसन्न हुए कि अपने लिए सुरक्षित मनोहर स्वर्ण पदक मुझे देने की घोषणा कर दी और बच्चनजी ने कहा तुम्हारा तो गला काट लेने लायक है. निराला और रवींद्रनाथ में उनके अनुसार यह बारीक अंतर है कि निराला में कुछ भी व्यवस्थित नहीं, सब कुछ अनगढ़ है, जबकि रवीन्द्रनाथ में सब कुछ व्यवस्थित और संवारा हुआ.
    शास्त्रीजी इस बात को नहीं भूल पाते हैं कि वे बनारस घूमने गए थे और किस तरह मालवीयजी उनके एक भाषण से इतने प्रभावित हुए कि कहा कि तुम यहीं रहकर पढ़ो और उनके पढ़ने की पूरी व्यवस्था की. वे कहते हैं, ‘मैं आज जो कुछ भी हूँ उन्हीं की कृपा से हूँ.’ एक बार फिर वे अतीत में डूबते हुए बताते हैं, ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन दिनों संस्कृत और हिंदी का वर्ग ११ बजे तक ही हुआ करता था. इसलिए मिलने-जुलने और लेखन के लिए पर्याप्त समय होता था. यहाँ विविध क्षेत्र के विविध लोगों से परिचय हुआ. वातावरण और प्रेरणा रचना के लिए बहुत बड़ी चीज़ होती है. लेकिन साथ ही मनुष्य की जैसी भावना होती है रचना वैसी ही होती है. हजारी प्रसाद द्विवेदी और शांतिप्रिय द्विवेदी दोनों एक ही जगह रहते थे लेकिन दोनों की रचनाओं में कितना अंतर है- यह अंतर दृष्टि का है, भावना का है. अपने लेखन की चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘मैं जो इतना लिख पाया उसके पीछे मूल कारण है अभाव. उस समय मेरे पास एक ही धोती-कुर्ता था, जिसे मैं रात में धोता और सुबह पहनता था. अभाव मनुष्य को भटकने से रोकता है.’
    छात्र-जीवन की मधुर स्मृतियों में खोते हुए शास्त्रीजी बताते हैं कि कैसे अनेक तरह की चिड़ियों की आवाजों का पीछा करते हुए मीलों तक चले जाया करते थे और कैसे कभी गंगा की लहरों के बनने और विलीन होने की प्रक्रिया को घंटों निहारा करते थे. ‘मैं बाकायदा राग-रागिनियों में पढता था. यह मध्यप्रदेश के रायगढ़ की देन है, जहाँ मैं १८ साल की उम्र में राजकवि बनकर गया था. वहां जो भी गीत लिखता था उसे गाकर सुनाना पड़ता था. ‘किसने बांसुरी बजाई’ गीत ह्रदय के भीतर से निकला आकुल-व्याकुल सवाल था, जो रात में किसी देवव्रत की बांसुरी की आवाज़ सुनकर उठा था. गीत तो बाद में बना, जब उसमें जुड़ा ‘जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई?’ थोड़ी देर रूककर वे कहते हैं, मानो अपने आप से कह रहे हों, ‘कविता की बात करना बहुत आसान है और समझना मुश्किल. कविता को समझने का मतलब है कवि के पूरे व्यक्तित्व को समझना.’
    अचानक खामोश हो जाते हैं, सर को झुकाए, मानो किसी तपस्या में लीन हों. तभी अपने आसपास सोये-लेते कुत्ते और उसके बच्चों को दुलराते, बिस्कुट खिलाते अचानक वे बेचैन से होने लगते हैं. ‘मेरा मन नहीं लगता है, बहुत बेचैनी होती है. ‘मैं क्या करूँ? मैं बहुत अकेला हो गया हूँ. वे लोग, वह युग, वह दुनिया कहाँ चली गई? मुझे समझने वाला कोई नहीं है. मैं किससे बातें करूँ? अब न तो स्वास्थ्य है, न वातावरण, न वह प्रेरणा… मैं क्या पढूं और क्या लिखूं? पाँव भी होते तो कम से कम परिसर में ही चल-फिर पाता, इस तरह निर्भर तो नहीं रहता दूसरों की दया पर. मैं तो साहित्य को भूल रहा हूँ…’
    शास्त्रीजी पर वृद्धावस्था का असर साफ दिखता है, मगर अब भी गीत गुनगुनाते समय उनके चेहरे पर जो चमक आती है, वह उम्र को दस साल कम कर देती है. आज की पीढ़ी से आप कुछ कहना चाहेंगे? इसके जवाब में शास्त्रीजी कहते हैं, ‘मैं यही कहना चाहूँगा कि समय एक समान नहीं रहता, उसे बराबर बदलते भी रहना चाहिए. अगर मेरा मन दूसरे प्रकार की चीज़ों से आनंदित होता है तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए. उसे पुराना कह-कह कर बार-बार ठुकराया जाए, उसका अपमान किया जाए, यह उचित नहीं. वैसे भी एकरसता से मन ऊब जाता है, तो लोग दूसरी तरह की रचना चाहते ही हैं.’
    मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे शास्त्रीजी की कविता सुने का अवसर तब से मिला जब मैं नहीं जानती थी कि कविता क्या होती है. उनसे विदा लेकर आवास में आते हुए, जो अभी हाल तक उनका ही परिसर था, मुड़कर देखती हूँ, वे सर झुकाए तपस्यालीन बैठे हैं. उनकी खामोश आवाज़ में कविता की ये पंक्तियाँ अपने तमाम आरोह-अवरोह के साथ देर तक बजती रहती है-
    कोई बात है मन कि हारा नहीं है
    ये मंझधार ही है किनारा नहीं है.
                        

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