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    वीरेंद्र प्रसाद की चार कविताएँ

    By December 31, 2022Updated:December 31, 202213 Comments3 Mins Read

    डॉ. वीरेन्द्र प्रसाद अर्थशास्त्र एवं वित्तीय प्रबंधन में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है और वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। वे पशु चिकित्सा विज्ञान में भी स्नातकोत्तर  हैं। रचनात्मक लेखन में उनकी रुचि है। प्रस्तुत है भीड़भाड़ से दूर रहने वाले कवि-लेखक वीरेन्द्र प्रसाद की कुछ कविताएँ जिनको पढ़ते हुए आपको गीतों का आनंद आएगा-

    =====================

    संतुलित आनंद के पल
    समग्र सौन्दर्य में विकल
    रस गंध स्पर्श से परे।

    रंग गंध अकूल आनंद
    अगम शांति, मधु मरंद
    सौम्य मुख, वसंत छंद
    कलुष के स्पर्श से परे।

    रव छंदों में बंधे नहीं
    शिल्प भाव के सधे नहीं
    अतिवात आनंद जगे नहीं
    उन्मत्त स्पर्श से परे।

    सुबह सांझ, अधूरे उपमान
    बेरंग है, बाहरी परिधान
    लावण्य निविड़ अभिमान
    किसलय स्पर्श से परे।

    अगम रूप से परे
    अंतः स्मित से गहरे
    मानव मूल्यों पर ठहरे
    सन्निध स्पर्श से परे।

    ओ चंदा, देहबोध नहीं
    रसवृंत पर तुम खिले
    शुभ्र मानस लावण्य हो
    अवचेतन उर में पले।

    ===============
    जब चांद क्षितिज पर आये
    मन क्षण का कुहक बिछाये

    अंगार खिलौनों का अनुरागी
    उसने मुझमें मकरन्द भरा
    संचित निधि आलोक लुटा
    झर झर उर सौरभ बिखरा
    हॅस प्रलय से बांध तरणी
    खींच झंझावात, अंक लगाये
    जब चाँद क्षितिज पर आये।

    गाढ़े विषाद पंकिल मन
    शत निर्झर में हो चंचल
    विद्युत सा, उजला निमंत्रण,
    नित उर्मिल करूणा जल
    अब बिंघ गये पग में शूल
    बेसुध कर, उर स्वर्ण उड़ाये
    जब चाँद क्षितिज पर आये।

    निमिष का वह एक पल
    चिर सुर धारा चुम रहा
    अंगारो का मृदु रस पीकर
    केशर किरण सा झूम रहा

    पाथेहहीन जब छोड़ गये सब
    तब उसने चिर संकेत बुलाये
    जब चाँद क्षितिज पर आये।

    हीरक कंचन, नीलम, मरकत
    इनसे नहीं बनता जीवन मोती
    दोनों संगी एक राह चले
    अगम आभा स्पंदन होती
    मरू रज में अंकुर निकला
    अक्षय यति बन प्राण बुलाये
    जब चाँद क्षितिज पर आये।
    ==============

    तुमसे मिलकर मेरे नयन
    अतिदूर हो गये, दुरित शयन।

    अमल मन खिल गया अंग
    जैसे प्रातः शतदल के रंग
    कानन कानन पावन पल
    भ्रमर गुंजन जलधि तरंग
    उसकी छाया मन तरू पर
    कांधे अलक अंगराग वयन
    तुमसे मिलकर मेरे नयन।

    विहग विहग नव गगन राग
    काम, क्रोध, मद बने पराग
    विकल अधर विमल गात
    दीप जले, साधना अनुराग
    रूखे सुखे जीवन तट पर
    खिले इन्द्रधनु, कर तुम्हें चयन
    तुमसे मिलकर मेरे नयन।

    आज हृदय बसा अमर छंद
    उस स्पन्दन का लहरी अमंद
    हर सांस तुम्हारी रचना का
    हर पुलक तुम्हारा भाव बंध
    अनदेखा एक ताग सिल गये
    रच डाला मधुरिम अयन
    तुमसे मिलकर मेरे नयन
    अतिदूर हो गये, दुरित शयन
    ===========

    अब वेदना वरदान बन गया
    नेह तुम्हारा निर्वाण बन गया।

    श्वेत क्षीर फेन हीरक रज से
    अम्बर ज्योत्सना से निर्मित
    उर झंझा पर नित हँसने वाले
    चन्द्रहास के चिर रंगों में चित्रित
    प्रलय मेघ भी गले यहां पर
    मोती हिम तरल उफान बन गया
    नेह तुम्हारा निर्वाण बन गया।

    अंजन वेदना गुंजित हर दिशा में
    जैसे आनन पर अवगुंठन डाले
    रजनी भी तम मरकत वीणा पे
    हँस हँस किरणों का तार संभाले
    शत शूलों के गरल का आलेपन
    नव मधुपर्क समान बन गया
    नेह तुम्हारा निर्वाण बन गया।

    मिटने को हर सांस लिख रहा
    सजल चितवन ज्वलित गान
    निज खोकर भी निमिष आंकते
    अनदेखे शतरंगी चरणों की तान
    पल भर का वह सपन तुम्हारा
    अलख अगोचर पहचान बन गया
    नेह तुम्हारा निर्वाण बन गया।

    नभ तम अपरिमित भले हो
    राह का चिर साथी सबेरा
    हर खोज का है अन्त प्रियवर
    तृण कण में भी रूह का बसेरा
    मिटकर भी नित मोल चुकाता
    वह निमिष अब प्राण बन गया
    अब वेदना वरदान बन गया
    नेह तुम्हारा प्राण बन गया।

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