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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    होगा कोई ऐसा जो ग़ालिब को न जाने

    By December 27, 202328 Comments8 Mins Read

    आज ग़ालिब को याद करने का दिन है। युवा शोधार्थी अनु रंजनी अपने विद्यार्थी दिनों से जोड़कर ग़ालिब को याद किया है। आप भी पढ़ सकते हैं-

    ==============================

              ‘ग़ालिब आप को क्यों पसंद हैं?’ यह सवाल जब बीए में पूछा गया था तब दिमाग़ नंबर ज़्यादा कैसे आएगा इस के अनुसार काम कर रहा था । इसलिए आज इस सवाल पर सोचते हुए लग रहा कि चार साल पहले जो जवाब लिखा होगा वह निश्चित ही नंबर के कारण प्रभावित हुआ होगा। आज न नंबर का, न किसी और बात का कोई दबाव है ।

            आज सोचने पर पहली बात यही आ रही कि ग़ालिब क्यों पसंद हैं? यानी कोई भी कवि क्यों किसी की पसंद बन जाते हैं? ज़ाहिर है, अपनी कविताओं के कारण। यानी ग़ालिब भी अपनी कविताओं के कारण पसन्द हैं । लेकिन इसके साथ ही यह बात भी अंतर्निहित है कि कवि तो बहुत से हैं, फिर सबकोई तो पसंदीदा नहीं होते? इसका मतलब यह कि ग़ालिब की कविताओं की विशेषताएँ ऐसी हैं जो उन्हें बाक़ियों से अलग बनाती हैं । और वह विशेषता है ग़ालिब का हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ना ।

             ग़ालिब के नाम पर यह ग़लतफहमी खूब बनी हुई है कि उनका लिखा प्रेम संबंधी ही है । यों भी शायरी, ग़ज़ल, इन सबको प्रेम से ही जोड़ कर देखा जाता रहा है । ग़ालिब का एक शेर, कुछ शब्दों के हेर-फेर के साथ लोक में खूब प्रचलित है

                                  “ये इश्क नहीं आसान,बस इतना समझ लीजिए

                                   इक आग का दरिया है, और डूब के जाना है”

    इसलिए भी मन पर यही छाप पड़ती है कि ग़ालिब प्रेम के शायर हैं । लेकिन जैसे ही हमारा सामना उनकी विभिन्न ग़ज़लों से होता है, तो आश्चर्य के साथ-साथ ख़ुशी भी होती है कि ‘अरे, यह तो प्रेम से अलग भी लिख चुके हैं’ या प्रेम पर लिखते हुए भी कितना कुछ साथ लेकर चल रहे हैं ।

           ग़ालिब का जीवनकाल 27 दिसंबर 1779 ई. से 15 फरवरी 1869 ई. माना गया है । यानी ऐसा समय जब भारत में प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के बाद ब्रिटिश कंपनी अपना राज जमाने की ओर तेजी से बाढ़ रही थी । नतीज़न बदलाव बहुत तेजी से हो रहे थे । पुराना सब छूट रहा था और आगे क्या होगा? परिस्थिति क्या होगी इसका कुछ पता नहीं था । ऐसे ऊहापोह की स्थिति से जूझते हुए ग़ालिब शायरी कर रहे थे ।

          ग़ालिब का पारिवारिक जीवन भी ऐसा नहीं रहा जिसे खुशहाल कहा जा सके । लगातार आठ

    (संभवत:) नवजात बच्चों की मृत्यु और पैसे की तंगहाली से किसकी स्थिति ठीक मानी जा सकती है?

    अत: एक तो राजनीतिक उथल-पुथल दूजे घर की स्थिति दोनों के बीच ग़ालिब का जीवन बीता । ऐसे में ग़ालिब जो लिख रहे थे उसमें गम, नाउम्मीदी, उम्मीद, घर, बदलते परिवेश से उत्पन्न नई परिस्थितियाँ, मसलन बाज़ार, सब की उपस्थिति मिलती है और प्रेम तो खैर है ही ।  अत: ग़ालिब की शायरी व्यक्तिगत अनुभवों को समझने के साथ-साथ तत्कालीन समय को समझने का भी माध्यम बन जाती है ।

    आगे कुछ शेर इन्हीं से संबंधित हैं ।

                                              मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था

                                               दिल भी या-रब कई दिए होते

    उक्त शेर यह बताने के लिए काफी लगता है कि किसी के जीवन में इतने दुख हैं कि उसे कहना पड़ रहा है कि जब ग़म इतना है तो ईश्वर के दिल भी एक क्यों दिया? दो दिल से भी उसका काम नहीं चलने वाला, उन ग़मों के लिए तो कई दिल चाहिए ।

                                       कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब

    देखा तो कम हुए प ग़म-ए-रोज़गार था

    वहीं एक ओर यह शेर है जिसमें इश्क का ज़िक्र तो हुआ है लेकिन केन्द्र में इश्क न होकर रोज़गार है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि उन बदलती परिस्थितियों में घर चलाने के लिए रोज़गार अनिवार्य हो चला था । इसलिए ग़ालिब को इश्क के ग़म की तुलना में रोज़गार का ग़म अधिक लगता है । अब यह रोज़गार का ग़म है क्या यह पढ़ने वाले अपने अनुसार सोच सकते हैं । यह ग़म रोज़गार न मिलने का भी हो सकता है या फिर रोज़गार करने में जो कठिनाई आ रही हो, वह भी हो सकता है । इसी तरह का एक और शेर वे कहते हैं जिसमें साफ़ तौर पर कहा जा रहा कि यदि इश्क का ग़म नहीं होता तब भी रहत नहीं होती, रोज़गार का ग़म तो होता ही, यानी ग़म स्थायी है –

                                   ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है

    ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता

    इतने दुख को देखने-झेलने के बाद भी ग़ालिब उम्मीद नहीं छोड़ते –

                               ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
    शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

           

            उम्मीद-नाउम्मीद, यह दोनों ग़ालिब के यहाँ है । एक ओर शायर खूब निराश है –

                                             कोई उम्मीद बर नहीं आती

                                             कोई सूरत नज़र नहीं आती

     

                                           कहते हैं जीते हैं उम्मीद प लोग

                                          हमको जीने की भी उम्मीद नहीं

     

                                      क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल

                                      इंसान हूँ पियाला ओ साग़र नहीं हूँ मैं

    (अर्थ- हमेशा की परेशानी से दिल क्यों न घबरा जाए? इंसान हूँ न कि हमेशा चारों ओर घूमने वाला एक शराब का प्याला)

    वहीं दूसरी ओर इसी शायर को कुछ अच्छा हो जाने की उम्मीद भी है –

    रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ

    हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएँ क्या

    अर्थात दुनिया अपने हिसाब से,अपने नियम से तो चल ही रही, इसी में मेरा भी कुछ न कुछ उपाय निकल जाएगा, घबराना क्या? या घबरा कर क्या होगा ?

    कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है

    अपने जी में हम ने ठानी और है

    यहाँ आत्मविश्वास भी है कि हमने दृढ़-निश्चय कर लिया है, अब अगर जीवन और बचा रह जाता है तो उसमें हम अपनी परिस्थिति को बदलने का प्रयास जरूर करेंगे ।

          तत्कालीन समय में बाज़ार का फैलाव शुरू हो गया था । बाज़ार का अर्थ ही होता है जहाँ सब कुछ मिल जाए, जहाँ से  कुछ भी खरीदा जा सके ।  इसलिए गालिब भी कहते हैं कि –

         तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे

       ले आएँगे बाज़ार से जा कर दिल ओ जाँ और

    खरीदने के लिए तब नकद की शुरुआत हो गई थी, इसकी अहमीयत भी शामिल ग़ालिब के यहाँ है –

    दिल-ओं-दीं नकद ला, साकी से गर सौदा किया चाहे

    कि इस बाजार में। सागर मता-ए – दस्त गरदाँ हैं।

     

         तत्कालीन समय में खबर पहुँचाना या मिलना तुरंत का काम नहीं था। इसमें कई तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ता था । खबर शब्द का परिप्रेक्ष्य आज की तुलना में, तत्कालीन समय में बहुत महत्त्वपूर्ण तथा कठिन था ।

    इसलिए जब ग़ालिब यह कहते हैं कि

    हमने माना कि तगाफ़ुल न करोगे लेकिन

    खाक हो जाएँगे हम तुमको खबर होने तक

    तो इसमें खबर के साथ पूरा सामाजिक पक्ष जुड़ जाता है, उससे संबंधित परेशानियाँ जुड़ जाती हैं ।

    इसी तरह खत लिखना एक महत्वपूर्ण हिस्सा था खबरों के आदान- प्रदान के लिए ।  चूंकि इसमे बहुत लंबा समय लगता था, इसलिए, इससे थोड़ी राहत की चाह में भी ग़ालिब लिखते है कि

    कासिद के आते-आते खत और लिख रखूँ

    मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में

    प्रेम में प्राय: एकनिष्ठता को अधिक महत्त्व दिया जाता है । स्त्रियों के लिए पतिव्रता होने की अनिवार्यता भी इसमें शामिल है । ऐसे में कोई पुरुष यह कभी नहीं चाहता कि वह जिससे प्रेम करता हो वह उसे छोड़ किसी और को चाहे । आज के समय में तो इस तरह के गाने भी खूब प्रचलित हुए कि तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं , तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी । इस मामले में ग़ालिब समय के अनुसार पीछे होकर भी विचार में बहुत आगे थे । उनके यहाँ प्रेम में तमाम बेवफाई, इंतज़ार के बावजूद प्रेम में एकनिष्ठता की बाध्यता नहीं है –

                                       तुम जानो तुम को गैर से जो रस्म-ओ-राह हो

                                          मुझको भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो ।

    आज के जमाने में कोई पुरुष अपनी चहेती स्त्री को यह कहे कि तुम बाकी को अगर प्यार करती हो तो करो लेकिन साथ में मुझ पर भी थोड़ा-बहुत ध्यान दे लो, यह असंभव लगता है ।

    ग़ालिब की शायरी प्रेम में समर्पण करना सिखाती है न कि सामने वाले पर कब्ज़ा –

                                     मेहरबां होके बुला लो मुझे, चाहो जिस वक्त

                                      मैं गया वक्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ 

           इन सबके साथ-साथ ग़ालिब को पसंद करने के पीछे एक कारण यह भी है, उनकी सवाल करने की प्रवृत्ति । ग़ालिब खूब सवाल करते हैं, कभी खुद से, तो कभी सबसे, कभी धर्म पर तो कभी पाखंड पर।

    खुद से सवाल करते हुए वे कहते हैं-

                                    ‘काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब

                                        शर्म तुमको मगर नहीं आती

    इसी तरह जब वे कहते हैं कि –

    कहाँ मैखाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहाँ वाइज़

    पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

    इससे भी वे धर्म के पाखंड को रेखांकित करते हुए सवाल ही करते हैं ।

             यूं तो हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल की शुरुआत 1850 ई. से मानी जाती है लेकिन ग़ालिब की शायरी से गुजरते हुए यह लगता है कि उनके यहाँ आधुनिक स्वर बखूबी उभरा है ।

           यह कुछ ही उदाहरण हैं लेकिन यह उदाहरण भी हमारे रोजमर्रा के जीवन से जुड़ते हैं जो आज भी, ग़ालिब के जाने के लगभग 200 साल बाद भी उन्हें हम सब के बीच उपस्थित रखे हुए हैं ।

     

     

     

     

     

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