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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    बुदापैश्त में हिन्दी: विजया सती

    By January 6, 2023694 Comments8 Mins Read

    हिंदू कॉलेज की सेवानिवृत्त प्राध्यापिका विजया सती अपने अध्ययन-अध्यापन जीवन के संस्मरण लिख रही हैं। हम पहले चार किस्त पढ़ चुके हैं। यह नई कड़ी है। आप भी पढ़िए-

    ==================

    कॉलेज में अध्यापन करते हुए अवसर भरपूर मिलते कि हम कुछ और कर सकें. हमारे अग्रज और कनिष्ठ – बहुत से सहयोगियों ने बहुत कुछ किया है.

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा दी जाने वाली कई फेलोशिप हम पढ़ाने वालों के लिए शोध के क्षितिज खोलती रही हैं. एक बार ‘टीचर फेलोशिप’ और दूसरी बार ‘कैरियर अवार्ड’ के लिए चयनित होने पर मैंने दो शोध कार्य किए. पहले भवानी प्रसाद मिश्र की कविता पर काम किया और दूसरी बार ‘सन साठ के बाद की हिंदी कविता में प्रकृति: तकनीकी विकास के कारण आए परिवर्तनों के संदर्भ में’ ..यह विषय विस्तार कवि केदार नाथ सिंह द्वारा सुझाया गया जो चयन समिति के सदस्य थे.

    2007 में मुझे प्रतिनियुक्ति – deputation – पर विश्वविद्यालय के ‘जीवन पर्यंत शिक्षण संस्थान’ में काम करने का अवसर मिला. दिल्ली विश्वविद्यालय के नवनिर्मित जीवन पर्यंत शिक्षण संस्था अर्थात  Institute of life long learning, संक्षेप में ILLL – में ई कंटेंट निर्माण की परियोजना में हिंदी जगत के दो दिग्गज प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी और प्रोफेसर अशोक चक्रधर के नेतृत्व में बहुत कुछ सीखा. अशोक चक्रधर हिन्दी सेक्शन की यूनिट्स की प्रगति देख रहे थे. विश्वविद्यालय के हिन्दी पाठ्यक्रमों का ई-कंटेंट विकसित किया का जा रहा था, हम एक सुनिश्चित प्रारूप में, अपने सहयोगियों से उन्हें लिखवाते, सुधारते और फिर उनका निरीक्षण होता.

    लेकिन यहाँ तक पहुँचने से पहले, कंप्यूटर का छात्र मेरा पुत्र मुझे कंप्यूटर ‘इलिट्रेट’ साबित कर चुका था, ‘कुछ सीख लो’ की हिदायत दे चुका था. एक सुबह अशोक चक्रधर जी ने आदेश दिया कि अपने कंप्यूटर से इस काम को अंजाम देकर मुझे तुरंत भेजो. अभी मैने कंप्यूटर साक्षरता की ओर कदम बढ़ाया ही था कि ओले गिरे ! यह बेढब काम मुझसे कैसे होगा? नहीं जानती थी. फिर घर पर थे विंडो ऑपरेटिव सिस्टम और यहां एकदम नए शानदार ऐपल मैकनटोश डेस्क टॉप !

    लेकिन यही वह क्षण भी था जिसने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया, या यूं कहूं कि कंप्यूटर ने खुद सिखाया. दरअसल कंप्यूटर है ही यही – सीखो और आगे बढ़ो, फिर बढ़ते रहो. इस समय के बाद फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

    मेरे लिखने-पढ़ने की दुनिया बदल गई थी. अब मैं हाथ से काटा-पीटी न करके, आराम से अपने  लिखे को ऊपर-नीचे कॉपी-पेस्ट कर लेती थी. उस दिन की बदौलत ही जो पाया, आज यह लेखन उसकी गवाही दे रहा है.

    आई ट्रिपल एल ILLL में एकदम नए शानदार एपल मैकनटोश के सामने बैठ कर दुनिया की जैसे नए सिरे से सैर की. यह भी जीवन का एक रोचक चरण था. संस्थान के खूबसूरत परिसर के सुव्यवस्थित कमरों में बैठकर हम – अलग-अलग कॉलेज के प्राध्यापक अपना-अपना कंटेंट निर्मित करते और करवाते. दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेज में हिन्दी पढ़ाने वाले कितने ही साथियों से यहाँ मेरी मुलाक़ात हुई और फिर दोस्ती परवान चढी.

    हिन्दी की बदौलत ही मैं विदेश गई और दो विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाने का अद्भुत अनुभव हासिल किया – 2011 में हंगरी की राजधानी बुदापैश्त के ऐल्ते विश्वविद्यालय में और 2014 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सिओल की विख्यात हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़ में.

    बुदापैश्त में हिन्दी

    भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् यानी आई सी सी आर के सौजन्य से विदेशों में स्थापित हिन्दी पीठ – Hindi Chairs पर भारतीय अध्यापक विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में भेजे जाते हैं. 2011 की सर्द सुबह मैं उत्तरी यूरोप के देश हंगरी की राजधानी बुदापैश्त के लिए जब रवाना हुई, उस समय मुझे हरिऔध की ‘एक बूंद’ कविता याद आई…

    ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
    थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
    सोचने फिर फिर यही जी में लगी
    आह क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी

    दैव मेरे भाग्य में क्या है बदा
    मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में
    या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी
    चू पडूँगी या कमल के फूल में

    बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
    वह समुन्दर ओर आई अनमनी
    एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
    वह उसी में जा पड़ी मोती बनी

    लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
    जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
    किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
    बूँद लौं कुछ और ही देता है कर !

    यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी, और वह भी अकेले. लेकिन यहाँ आकर जाना कि यात्राएं और उनके अनुभव हमें कितना समृद्ध करते हैं !

    बुदापैश्त के विख्यात ओत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग में डॉ मारिया  नेज्येशी के साथ हिंदी पढ़ाने का अनुभव अनूठा रहा. घनी सर्दियों के मौसम में वसंत सत्र के लिए मैं वहां पहुँची थी. तब का भारोपीय अध्ययन विभाग अब भारत अध्ययन विभाग कहलाता है. अनुशासित, गंभीर, छोटा-सा विभाग, हिन्दी-संस्कृत की नई-पुरानी पुस्तकों की भरी-पूरी लाइब्रेरी, भारत के प्रति छात्रों की गहरी अभिरुचि, इतनी कि हर छात्र भारत यात्रा को तैयार, भारत में भी वाराणसी उनकी पहली पसंद. भारतीय नृत्य-संगीत-कला-वेशभूषा और आभूषणों में गहरी रुचि रखने वाले छात्रों का संग-साथ विदेश में मन लगाने को बहुत था.

    यूरोप का हृदय कही जाने वाली सुन्दर पर्यटन नगरी बुदापैश्त के विख्यात विश्वविद्यालय में, पांच सेमेस्टर हिन्दी पढ़ाते हुए, जिन अन्य सहयोगियों का साथ मिला वे थे – प्रोफेसर माते, डॉ देजो चबा, किश चबा और गेर्गेई हिदाश.

    जब मैं बुदापैश्त में थी, एक दिन मेट्रो स्टेशन में एस्केलेटर पर पास खड़ी सुंदर हंगेरियन लड़की मोबाइल पर बात करते हुए दोहरा रही थी – इगेन इगेन इगेन. जिज्ञासु भाव से अर्थ जानने की कोशिश में विभाग पहुँचते ही मैंने ‘सोतार’ यानी शब्दकोश देखा – मन संतुष्ट हुआ – शुरुआत अच्छी रही, इगेन का अर्थ था हां !

    फरवरी में वसंत सत्र आरम्भ होते ही विभाग में हिन्दी दिवस की तैयारियां शुरू हुई. धूम तो भारत में होती है..14 सितंबर .. हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा, हिन्दी माह आदि आदि आदि. किन्तु विदेश में 10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस के आयोजन का दिन था. इन्हीं दिनों परीक्षा के बाद सर्दियों की छुट्टियां हो जाती हैं. इसलिए नए सत्र के आरंभ में तैयारियों के साथ हिंदी सीखने वाले विद्यार्थी प्रस्तुत हुए .. अधिकतर भारतीय परिधान में.

    अज्ञेय से लेकर कुंवर नारायण तक की कविताओं का पाठ हुआ, नाट्य प्रस्तुति और नृत्य भी .. पूरे उत्साह के साथ भारत की छवियां साकार.

    बुदापैश्त में मुझे मिले हंगरी के प्रेमचंद यानी उपन्यासकार मोरित्स जिग्मोंद – गरीब-बेसहारा-किसान-मजदूर के दुःख दर्द को शब्द देने वाले, प्रेमचंद सरीखे हंगरी के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानीकार मोरित्स जिग्मोंद. उनकी विख्यात कहानी सात पैसे विश्व की कई भाषाओं में अनूदित है – हिन्दी में भी.

    यहीं जाना क्रान्ति और प्रेम को जीवन में एक समान महत्व देने वाले कवि पेतोफी शांदोर को ! एक छोटे पहाड़ ‘गैलर्ट हिल’ पर, गार्डन ऑफ़ फिलॉसफी में मिले अपने बापू – महात्मा गांधी. यहीं मिली भारत प्रेमी, हंगरी में हिन्दी की पहली जानकार डॉ एवा अरादि. डॉ अरादि ने एक बार अपने पति के साथ भारत प्रवास में मुम्बई में, भारतीय विद्या भवन में हिन्दी भाषा सीखी. 1975 में छात्रा के रूप में नागपुर में पहले हिन्दी सम्मलेन में भाग लिया. यहीं से हिन्दी लेखकों की गरिमावान पीढ़ी – महादेवी वर्मा, जैनेन्द्र कुमार, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव – को सुनकर उनके लेखन के अनुवाद के प्रति उनका रुझान हुआ. उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यास निर्मला और दस कहानियों का हंगेरियन भाषा में अनुवाद किया. उम्र के बयासिवें वर्ष में डॉ अरादि भारत में हमारे प्राच्यविद – Our Orientalists in India शीर्षक पुस्तक तैयार कर रही हैं – आने वाले समय में हंगेरियन भाषा में इसका प्रकाशन होगा.

    और यहीं मिले एम. ए. हिन्दी के छात्र के रूप में पीटर !

    हम तो इन्हें पीटर ही पुकारते रहे – लेकिन जब एकदम विशुद्ध होना हो तो वे अपना नाम पैतेर लिखते. हंगरी में ट, ठ, ड जैसी कठोर ध्वनियां नहीं हैं – इसलिए राजधानी के बीच बहने वाली नदी भी डैन्यूब नहीं दुना कहलाती है.

    पीटर को हद दर्जे के शुद्धतावादी के रूप में धीरे-धीरे जाना ! व्याकरण की भूलों के प्रति सजग और प्रश्न पर प्रश्न करने वाले. उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ विविध थीं. भाषाओं और लिपियों में रूचि, शब्द की निर्मिति को जानने में रूचि, फिल्म और संगीत में रूचि, घुमक्कड़ी में रूचि – ये सब विशेषताएं मिलकर पीटर का व्यक्तित्व बनाती.

    पीटर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में आरंभिक हिन्दी पढ़ने आए, फिर शोध करने लौटे भारत – पूरे पांच साल भारत की धूप, सर्दी, बरसात खुशी-खुशी खूब झेल ली. पीटर के एडवेंचर ऐसे कि हिमाचल में जंगल के रास्ते ट्रेकिंग से लौटते हुए भालू से भिडंत होते-होते बची. ऐसा लगता कि पीटर ने जो भारत देख लिया वह हमने भी नहीं देखा.

    हद दर्जे के घुमक्कड़, हद दर्जे के पढ़ाकू पीटर हमेशा भारतीय पोशाक में दिखे – अधिकतर कुर्ता-पाजामा. भारतीय रंगों के घनघोर प्रेमी. निडर.. निर्भीक.. साहसी.. मुखर.. खरे.. पीटर ने भारतीय गाली कोश बना डाला !

    तमाम परेशानियां भुगतकर भी पीटर को भारत और उसके लोगों से प्यार है. वे भारत को खूबसूरत और खुशहाल देखना चाहते हैं ! जब भी मैं बुदापैश्त में हिन्दी के विषय में सोचती हूँ, भले इंसान, मेहनती छात्र और बेहतरीन शोधकर्ता पीटर को भुला नहीं पाती …..

    विजया सती

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