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    वीरेंद्र प्रसाद की नई कविताएँ

    By May 26, 2023110 Comments4 Mins Read

    डॉ. वीरेन्द्र प्रसाद अर्थशास्त्र एवं वित्तीय प्रबंधन में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है और वे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। वे पशु चिकित्सा विज्ञान में भी स्नातकोत्तर  हैं। रचनात्मक लेखन में उनकी रुचि है। प्रस्तुत है भीड़भाड़ से दूर रहने वाले कवि-लेखक वीरेन्द्र प्रसाद की कुछ कविताएँ जिनको पढ़ते हुए आपको गीतों का आनंद आएगा-

    ==================

    जब नजर चुराते हो
    सपनों में क्यों आते हो।

    रोकूं, कर जीवन अधीर
    ओट करे न सजग पीर
    कण कण सौंप रहा तुम्हें
    जैसे सागर को नीर
    पर अविराम पुकार कर
    फिर क्या समझाते हो
    जब नजर चुराते हो।

    रात सी नीरव पहचानी
    तम सी अगम कहानी
    तिरते नयनों में मोती
    सित तम का क्षणिक पानी
    जला कर नेह पुलकित
    किस आतप बचाते हो
    जब नजर चुराते हो।

    शून्य में अब कहां तेरे
    विद्युत भरे निश्वास मेरे
    झंझा झुंड समेटे उर में
    है इंगित, होगा सबेरे
    पुलक का चिर निबंध
    क्या नया रचाते हो
    जब नजर चुराते हो।

    निमेष तुम्हारा अमर छंद
    स्पंदन है लहरी अमंद
    जाने कितने रूप तुम्हारे
    अगोचर तेरे भाव बंध
    जनपथ, अभिसार अकथ
    क्या हाथ बटाते हो
    जब नजर चुराते हो
    सपनों में क्यों आते हो।

    ——————-

    चंचल सपने भोले है
    जिनको पलकों पे तोले है
    देकर सौरभ पंख इसे
    दूर क्षितिज तक पहुंचाना
    सांझ ढ़ले तब आना।

    मोती संभाले मोम सीप
    आये शूल फूल समीप
    देकर विद्युत चरण इसे
    चिर उर की राह बताना
    सांझ ढ़ले तब आना।

    क्षण उड़ते, पुलक भरे
    ज्वाला चुंबन से निखरे
    देकर चैतन्य प्राण इसे
    सुधि सुरभित धाम बसाना
    सांझ ढ़ले तब आना।

    अन्य होंगे चरण हारे
    शूलमय हो पंथ सारे
    देकर समिधा तन मन इसे
    इतिहास को अजर बनाना
    सांझ ढ़ले, तब आना।

    अमिट मसि के चितेरे
    शून्य में भी हो बसेरे
    छूकर बंधन की बांध इसे
    घुलने का वर दे जाना
    सांझ ढ़ले तब आना।

    ——————-
    फिर आज शाम, उदास सी है
    आतप अनल पारावार सी है
    बिखरा है हर तार मन का
    साँस शत शिला के भार सी है
    श्रांत बेसुध उर है अलसित
    बन आसव पुलिन अनजान
    आज मुझे तुम दे वरदान।

    विरह अचर भार जैसा
    मलयानिल अंगार जैसा
    अंगारक तरी तम से गढ़ा
    उलझे पग अमिट तार जैसा
    अब पलक है निर्निमेषी
    रच नव करुण कोमल गान
    आज मुझे तुम दे वरदान।

    विरत ज्वाल रव विहंग
    निरत लीन मृदु दीपित संग
    बन कर ही साकार हुआ
    करुण पीर के वसंत रंग
    जग अनन्त का अमर अंत
    सुख दुख जीवन निर्वाण
    आज मुझे तुम दे वरदान।

    तारक कुसुम पथ के विधाता
    चिर अकथ गति नाम पाता
    संसृति के नित पग में मेरी
    नीरव व्यथा अगम लुटाता
    खोज रहा उस अचर गति को
    मिटने का अमिट पता जान
    आज मुझे तुम दे वरदान।

    ——————-

    सांसों का आरोह, अवरोह उर का
    पगचाप का संलाप, सम अमर का
    मेघों का खेल, पर गीत है अनमेल
    नस नस में विद्युत की झंकार
    बिन तेरे, अब बेसुरे, सब तार।

    निश्वासहीन सा मन मेरा सोता
    मूक व्यथा संग अम्बर रोता
    मेरे सुख चंचल, मेरे दुख मंथर
    ज्वलित नयन, सजल मेघ मलार
    बिन तेरे, अब बेसुरे, सब तार।

    मृदु स्वर्णिम आतप को गोद लिया
    चितवन ने अतल आमोद दिया
    अलबेली लहरों पर अंगार तरी ने
    रच डाला, कितने अमिट संसार
    बिन तेरे, अब बेसुरे, सब तार।

    लघु तृण से तारक तक बिखरे
    आहत प्राण संधान सा निखरे
    पल भर का वह स्वप्न तुम्हारा
    अभिनव मृदु, शत राग के शृंगार
    बिन तेरे, अब बेसुरे, सब तार।

    मधुतिक्त आतप नित रजनी लाती
    पिंग अरुण सित श्याम कर जाती
    करुण अंजुरी में प्यार भर कर
    सुरभित अजर नेह का ज्वार
    बिन तेरे, अब बेसुरे, सब तार।

    ——————-

    तुम सपने जगाती आओ
    मृदु हंसना सिखाती आओ।

    श्याम अंचल, अम्बर तल
    तारकों से चित्र उज्जवल
    घिरी घटा को चाप सा फिर
    अपनी पलकें उठाती आओ
    तुम सपने जगाती आओ।

    अधीर मन, विकल लोचन
    व्यथा से अभिसिक्त तन
    तृषित भू को पहली घटा सा
    नयन सुधा पिलाती आओ
    तुम सपने जगाती आओ।

    मौन सहते, मौन रहते
    मौन को निज हार कहते
    शीत में पहली किरण बन
    पता जय का बताती आओ
    तुम सपने जगाती आओ।

    चाह में खग, राह में पग
    चिर उलझनों में फंसा जग
    सागर की लहरों सा नित
    चिर क्रय गाथा सुनाती आओ
    तुम सपने जगाती आओ।

    लोक व्यथायें, सुख कथायें
    अब तोड़ कर रूढ़ी प्रथायें
    प्रातः के अभिषेक सा बन
    मृदु हंसना सिखाती आओ
    अगम्य दूरी मिटाती आओ
    मुझको उर में बसाती आओ
    तुम सपने जगाती आओ।

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