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         ज़िंदगी की व्यापकता से राब्ता: इन्तज़ार में ‘आ’ की मात्रा

    By October 21, 2023Updated:October 21, 202331 Comments9 Mins Read

    युवा कवि नवीन रांगियाल के कविता संग्रह ‘इंतज़ार में ‘आ’ की मात्रा’ की विस्तृत समीक्षा की है युवा शोधार्थी अनु रंजनी  ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

    ===================

            “इन्तज़ार में ‘आ’ की मात्रा” नवीन रांगियाल का पहला काव्य-संग्रह है। इनकी कविताएँ तीन श्रेणियों में विभाजित हैं – ‘प्रेम’ , ‘मृत्यु’ व ‘दुनिया’। लेकिन विभाजन के बाद भी सारी कविताएँ एक-दूसरे में शामिल भी प्रतीत होती हैं। कवि की ही एक पंक्ति में “मैं प्रेम और मृत्यु में फ़र्क नहीं कर सका”। फिर भी उन अलग-अलग श्रेणियों का स्वीकार्य है ।

             ‘प्रेम’ खंड प्रेम का बहुत ही सुंदर और ज़रूरी रूप हमारे सामने प्रस्तुत करता है। प्रायः प्रेम को सुख का पर्याय माना जाता है, हम यह मान लेते हैं कि प्रेम का मिल जाना, सबकुछ ठीक हो जाना होता है। इसलिए हिंदी फिल्मों में भी अमूमन यही देखने को मिलता है कि हीरो-हीरोइन मिलते हैं, उनमें प्रेम होता है, साथ ही समाज की ओर से कई मुश्किलें आती हैं, लेकिन उन तमाम मुश्किलों को पार कर विवाह होता है और फिल्म ‘हैप्पी एंडिंग’ या ‘द एंड’ के साथ समाप्त हो जाती है। लेकिन असल जीवन में ‘रॉबर्ट सी. सोलोमन’ का यह कथन “वास्तव में प्रेम बहुत ही साधारण है, यह पूरा ब्रह्मांड नहीं है, ना ही यह हमारी सभी समस्याओं को ख़त्म कर सकता है, कई बार यह हमारे लिए नुकसानदेह भी हो सकता है” यथार्थ के अधिक नज़दीक है और बार-बार याद आता है। चूँकि नवीन रंगियाल की कविताओं का एक हिस्सा प्रेम आधारित है, इसलिए यह मान कर जो भी उन कविताओं से रूबरू होंगे उन्हें शायद निराशा मिलेगी।

    पहली ही कविता ‘शेड’ में प्रेम में पा लेने, जीत लेने की मानसिकता का त्याग, परिस्थिति का स्वीकार्य सामने आता है-

    “ज़िंदगी में लाल और मरून रंग का इतना शेड काफी था

    उससे दूर

    और

    उसके बग़ैर जीने के लिए”

    इस खंड में सबसे अधिक जोर इसी बात पर है कि प्रेम खंड-खंड में नहीं किया जा सकता, वह पूरी संपूर्णता में होता है। यहाँ प्रेम में उम्मीद भी है –

    “यह पूछना कि ‘ बाहर कौन है?’

    दिल का जोर-जोर से धड़कना है”

    प्रेम में परिस्थिति का स्वीकार्य भी है-

    “दरवाज़े के उस तरफ़

    उसका नहीं होना

    कविता है”

    प्रेम में इंतज़ार भी है-

    “आँखें बन्द करना

    और दरवाज़े की दस्तकों पर हैरान होना

    प्रेम है

    प्रतीक्षा है।”

    ‘मैंने उन सबसे प्रेम किया’ व ‘ आँखों का दोष’ शीर्षक संपूर्णता में प्रेम की बात करती है, प्रेम का विस्तृत रूप से हमारा परिचय कराती है। यह कविताएँ प्रेम के उस दर्शन की ओर संकेत करती हैं जहाँ प्रेम सिर्फ़ एक या दो लोगों तक सीमित न हो कर व्यापकता में शामिल है। इसलिए कवि उन सभी वस्तुओं से प्रेम करना स्वीकारते हैं जिनका वास्ता कभी प्रेमी/प्रेमिका से रहा हो, जैसे आईना, सीढ़ियाँ, रूम की चाबियाँ, खूँटियाँ, फ़र्श और वह सब कुछ जिसका स्पर्श उन हाथों और तल्वों ने किया था।

    ‘नमक पर यक़ीन’ यह मानकर चलती है कि सबकुछ अनिश्चित है। यहाँ प्रेमचंद की याद स्वाभाविक है जब वे ‘निर्मला’ में इस विचार को रखते हैं कि ऊपर जाने वाली साँस नीचे आएगी या नहीं, नीचे आने वाली साँस ऊपर आएगी या नहीं, यह भी हम नहीं जानते, और सोचते इतनी दूर की हैं जैसे हम अमर हों।

    ‘हिज़्र’ ऐसी कविता है जो प्रेम में मिलने वाले दुख के सत्य को जानते हुए यह कामना करती है कि प्रेमिका इस दुख से बची रह जाए। अपनी प्रेमिका को दुख से दूर रखने की कामना करना इस दुनिया को थोड़ा सुंदर बनाने की ओर एक कदम प्रतीत होता है‌ क्योंकि यह वह दुनिया है जहाँ न जाने कितनी लड़कियों को उनके प्रेमी (?) के बदले की भावना ने बर्बाद किया, न जाने कितनी बार हमारा ऐसी खबरों से सामना होता है कि लड़की ने मना कर दिया इसलिए उस पर तेजाब डाल दिया गया या उसकी हत्या कर दी गई, इत्यादि-इत्यादि।

    इन सबके साथ ही ये कविताएँ वर्तमान में रहते हुए स्मृति में विचरण कराती हैं, जो पाठकों के मन में टीस उत्पन्न करती है। यह स्थिति जैसे कविता दर कविता सामने आती है। ‘मेरी देवप्रिय’ में अपनी प्रेमिका को बुलाने की तरकीबें, कारण को बताना शामिल है, प्रेम में साथ होने की चाहत है लेकिन अगली ही कविता ‘गुमनाम पुल अच्छे थे’ में प्रेम के न मिल पाने की टीस है –

    ” सबसे अच्छा था तुम्हारा निर्ममता के साथ चले जाना,

    और पीछे मुड़कर नहीं देखना

    तुम्हारे जाने के बाद ही मैंने इन्तज़ार सीखे, देर तक एक ही जगह पर खड़े रहना सीखा”

    और फ़िर से अगली कविता ‘दिल’ में प्रेम के न मिल पाने की स्थिति का स्वीकार्य भी बेहद सहजता से किया गया –

    “जो प्यार नहीं मिल सका

    उसे किताब की तरह बरतना ही ठीक है

    उसके पन्नों को मोड़कर सिरहाने रख लेना चाहिए”

    मृत्यु, यह ऐसा शब्द है जिसे सुनकर शायद ही कोई ऐसा हो जो डरे न, या डर से इतर भी कोई दूसरे भाव हो सकते हैं लेकिन किसी के मन में ख़ुशी का भाव नहीं आता होगा। किंतु इस डर से होगा क्या? वह तो यथार्थ है और शायद सबसे निश्चित यथार्थ, जिसका सामना आज न कल सब को करना है। इसी यथार्थ का सामना करना ‘मृत्यु’ खण्ड की कविताएँ सिखाती है। इसका बेहतरीन उदाहरण है ‘लैला-मजनू’। यह कविता सभी की मृत्यु को बताती है, जो भी यहाँ आया है, उसकी मृत्यु निश्चित है, चाहे वह महान हो या सामान्य, अमीर हो या गरीब, विद्वान हो या अनपढ़, होश में हो या बेहोश हों, हर कोई एक दिन मर जाएगा।

           हमें लगता है कि हम मर जाएँगे तो लोग प्रभावित होंगे । होते होंगे, लेकिन किसी का जीवन नहीं रुकता।

           मृत्यु के अंतिम सत्य होते हुए भी दुनिया थमती नहीं, उसका काम ही है चलते जाना –

           “वापसी में सिर्फ़ इत्मिनान होगा

            हल्का और थोड़ा सा मुस्कराता हुआ

           जो इस तरफ़ आकर पसरकर बैठ जाएगा दुनिया में

           उसी जगह पर जहाँ कुछ देर पहले

           तुम्हें कसकर बाँधा गया था।”

    इस खंड की सबसे मार्मिक अनुभूति ‘कसमें’ पढ़ कर होती है। हमें पता नहीं कब क्या हो जाएगा? कब कौन मर जाएगा/जाएगी। जीवित रहने पर कसमें पूरा करने का दबाव होता है, लेकिन मरते ही सारे कसमों से हम मुक्त हो जाएँगे, और कोई हमपर बेवफ़ाई का आरोप भी नहीं लगाएँगे, क्योंकि मृत्यु ‘अंतिम सच’।

    खण्ड ‘दुनिया’, जैसा कि नाम से ही विस्तृत है, ठीक इसी तरह इसकी कविताएँ भी विस्तृत विषयों को समाहित की हुई है । इसमें भी सबका स्वीकार्य है।

            ‘सारी दुनिया उसकी लिखी साजिश है’ यह इस खण्ड की पहली कविता है और इसकी खास बात यह कि जैसे कोई रचनाकार अपनी रचना-प्रक्रिया से पाठकों को रूबरू करा रहा हो। जहाँ यह महत्त्वपूर्ण लगता है कि कवि कृत्रिम लेखन नहीं कर रहा, वह भले लिखने के बारे में सोचता है लेकिन यह सोच कर नहीं लिखता कि उसे लिखना है, बल्कि समय पाकर कविता खुद उसके भीतर प्रवेश करती है, उसके बाद वह कागज़ पर उतरती है। यहाँ घनआनन्द (1673 ई.) की प्रसिद्ध पंक्ति याद की जा सकती है “लोग हैं लागी कवित्त बनावत मोहि तो मेरे कवित्त बनावत”।

              इसके अलावा स्त्री-प्रश्न भी इस संग्रह में उपस्थित है जैसे ‘स्त्री और आग’ यह बताती है कि दुनिया कभी भी स्त्री के हक़ में नहीं रही। स्त्री को हमेशा इंसान की बजाय देह समझा गया, उसी में सीमित होकर उसका जीवन भी समाप्त हो जाता है। इस ओर ध्यान देते हुए कवि बेहद ही संवेदनशीलता से यह कहता है कि यदि प्रार्थनाएँ बेअसर नहीं होतीं तो वह “औरतों के लिए एक-एक रफूगर माँगता, जो उनके फटे हुए ब्लाउज और पेटीकोट सिलने के बदले नहीं माँगते उनकी देह”।

    “जब ट्रकों में लोहे के सरिये भरकर ले जाए जाते हैं

    तो मैं समझ जाता हूँ कि ये सरिये

    हिन्दुस्तान की लड़कियों के लिए ले जाए जा रहे हैं”

    उक्त पंक्तियाँ काफ़ी हैं यह बताने के लिए कि समाज में स्त्रियों की दशा क्या है? जो लोग ‘स्त्री-पुरुष अब एक समान हैं’ मानने वाले हैं उन्हें वे रिपोर्टें देखनी चाहिए जो भारत में बलात्कार की स्थिति को सामने लाती है । कुछ वर्ष पहले प्रत्येक पंद्रह मिनट पर बलात्कार होने का मामला दर्ज़ था, और न जाने कितनी ऐसी खबरें अनेक कारणों से दबा दी जाती हैं जिनमें मुख्यत: स्त्री और उसके परिवार की बदनामी का डर रहता है।

             इन सबके साथ ही सवाल की अनिवार्यता पर भी कवि का विशेष ज़ोर है। इस ओर संकेत करती

    यह पंक्तियाँ सटीक हैं-

    “ईश्वर होता तो मैं उससे यह सवाल पूछता

    अगर ईश्वर नहीं है तो मैं यह सवाल किससे पूछ रहा हूँ

    ईश्वर हो या न हो

    सवाल पूछे जाते रहना चाहिए”

    सत्ता, चाहे कैसी भी रहे, राजनैतिक, सामाजिक, पारिवारिक या धार्मिक, वह सबसे ज़्यादा सवाल से डरती है इसलिए अपने डर को छुपाने के लिए सवाल करने वालों को डराती है, उन पर ख़तरे डालती है। इसी सवाल पूछे जाने के ख़तरे का ‘बोलना और डूबना’ कविता समर्थन करती है-

    “बोलना मुश्किल है

    लिखना अच्छा

    सोचना

    लिखने से भी ज़्यादा अच्छा है

    और चुप रहना है

    सबसे सुन्दर

    और सबसे सुरक्षित

    डूबना घातक है

    और यह तब पता चलता है

    जब हम गहरे तक

    बहुत गहरे तक डूब चुके होते हैं। “

    भाषा की व्यर्थतता या उसकी सीमा, यह सब कुछ कवि अपनी कविताओं में व्यक्त करते हैं-

    “पहले कुछ नहीं था

    न बोलना

    और न ही चुप रहना

    फ़िर धीरे-धीरे दुनिया में व्याकरण आया

    और फ़िर पूरी दुनिया की भाषा

    ख़राब हो गयी”

    इसी तरह वर्तमान राजनीति में जो सबका हश्र है उसे व्यक्त करने के लिए ‘ख़तरा’ कविता सटीक है, काफ़ी है-

    “इन दिनों सबसे ज़्यादा ख़तरा दो ही चीज़ों से है

    ज़बान और रीढ़ से

    इसलिए

    सबसे पहले जबान काटी जाती है

    सबसे पहले रीढ़ तोड़ी जाती है

    फ़िर चाहे वो किसी आदमी की हो या हाथरस की किसी लड़की की हो

    इसलिए

    इन दिनों कोई जबान नहीं रखता

    कोई रीढ़ नहीं रखता।”

    इन सबके साथ-साथ कवि कविताओं के बीच ही कितने शहरों की (दिल्ली, भोपाल, पहाड़गंज) गलियों में भी चक्कर लगाते हैं और साथ ही अपने ‘कवि-पूर्वजों’ (ग़ालिब, मीर, मुक्तिबोध, कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा) को भी स्मरण करते जाते हैं और साथ ही हम पाठकों का भी सबसे परिचय कराते चलते हैं।

    इस तरह यह संग्रह जीवन की व्यापकता को उसके यथार्थ रूप में व्यक्त करने का एक सुंदर माध्यम बन जाता है।

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