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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    तसलीमा नसरीन की कविताएँ, अनुवाद- गरिमा श्रीवास्तव

    By April 1, 2024Updated:April 3, 2024No Comments10 Mins Read

    प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन की कुछ नयी कविताओं का बंगला से हिन्दी अनुवाद प्रोफ़ेसर गरिमा श्रीवास्तव ने किया है। आप भी पढ़ सकते हैं-

    ===========================

    1.मैं हूँ अनश्वर

    बुरका न पहनने पर त्रिपोली में जिस लड़की को सरे- राह मारा गया- वह मैं हूँ
    जर्सी पहन फ़ुटबाल खेलने पर ढाका में जिस लड़की को सताया गया- वह मैं हूँ
    अकेले देश बाहर जाने के जुर्म में जो लड़की रियाद की जेल में गयी- वह मैं हूँ
    प्रेम करने के अपराध में जिस लड़की को काबुल में संगसार किया गया- वह मैं हूँ
    पति ने पीटकर जिस लड़की की दमिश्क में हत्या कर दी- वह मैं हूँ
    शादी के लिए राज़ी न होने पर जिस लड़की की काइरो में हत्या कर दी गयी- वह मैं हूँ
    शांति स्थापना के प्रयास में मगाधीसू में रास्ते पर उतरी लड़की जो मारी गयी- वह मैं हूँ
    नहीं देखने दिया जाता मुझे प्रकाश की ओर
    नहीं खड़ा होने दिया जाता मुझे अपने पैरों पर
    ज्यों हूँ मैं पक्षाघात की शिकार जन्मजात
    दबा दिया जाता है मेरा गला अधिकार चाहते ही
    पीस दिया जाता है मुझे धर्म की चक्की में अधिकार की बात करते ही
    गाली दी जाती है वेश्या कह कर अधिकार मांगते ही
    जकड़ दिया जाता है मुझे जंजीरों में अधिकार चाहते ही
    कर दी जाती है हत्या अधिकार चाहते ही,
    जला दिया जाता मुझे आग में अधिकार चाहते ही
    हो गयी हूँ इस्पात जल -जलकर अंगारा नहीं
    मत आना मुझे लतियाने, तुम चूर चूर हो जाओगे
    मत आना चाबुक चलाने, दाग भी न पड़ेंगे मेरी देह पर
    मत आना धर्षित करने, लहुलुहान भी न होऊँगी मैं
    मत चलाना छुरी
    होगी नहीं मेरी मृत्यु

    2.तुम्हारे न रहने पर

    जाती हूँ जब भी बाहर टहलने
    तुम नहीं होते हो मेरे पास
    रेस्तरां, सिनेमा, थियेटर, कंसर्ट, दुकान-बाज़ार
    तुम नहीं होते मेरे पास
    घर लौट आती हूँ थकी हुई
    तुम नहीं होते मेरे पास
    लेट जाती हूँ बिछौने पर मैं एकाकी
    तुम नहीं होते मेरे पास
    अब तुम हो कहीं और
    शायद मिल गया है तुम्हें नूतन संग
    या कर रहे होगे हंसी-ठट्ठा पुराने संगी के साथ
    अब तो यह जानने को भी इच्छुक नहीं मैं
    कि तुम हो कहाँ ,किसके साथ और कर रहे हो क्या ?
    जहाँ भी हो रहो वहीँ ,चाहती हूँ यही
    हाथ भी न बढ़ाओ मेरे जीवन की ओर
    यही चाहती हूँ
    पाँव भी न धरो मेरे रास्ते पर
    यही चाहती हूँ
    आश्वस्त हूँ यह जान कि तुम नहीं हो
    अपने संसार में हूँ सिर्फ मैं
    मेरा संसार अब सिर्फ मेरा है
    जबकि इतने दिनों तक तुम्हारा संसार तो था ही तुम्हारा
    मेरा संसार भी तो तुम्हारा ही था
    जिसे छीन लिया था तुमने .
    इस छीनने को ही नाम दिया तुमने प्यार का .
    मेरे केश पकड़ जब तुम खींचते
    लगाते मेरे गाल पर चांटा
    समझती मैं यह तुम्हारे प्यार का अधिकार है
    प्यार के अधिकार से तुम घुमाते मेरे जीवन को तलहथी पर लट्टू-सा
    खेला करते बच्चों की तरह मनमाफ़िक
    जिस दिन मारी लात तुमने मेरी पीठ पर
    समझा मैंने तुम्हारे क्रोध का कारण खुद को
    प्यार नहीं कर पाती तुम्हें ठीक-ठीक
    हो गए हो तुम इसलिए पागल
    प्यार करते हुए तुमको खुद को ही खोखला किया है बारम्बार .
    तुम नहीं हो
    अब मैं गुड़िया नहीं तुम्हारे खेल की
    लट्टू नहीं संगमरमरी
    पतंग भी नहीं लटाई वाली
    रेत -धूल भी नहीं
    खरपतवार भी नहीं
    मेरुदंड सीधा कर खड़ी
    आपादमस्तक मनुष्य हूँ मैं
    तुम्हारे न रहने ने मिलाया है मुझको मुझसे
    तुम्हारे न रहने ने सिखाया है मुझको खुद से प्यार करना
    तुम्हारे न रहने ने सिखाया है ताकतवर बनना
    तुमने रहकर भी इतना कल्याण नहीं किया
    जितना तुम्हारे न रहने ने
    तुम इतने अर्थमय नहीं थे जितनी तुम्हारी अनुपस्थिति
    इतने तो तुम उत्सव नहीं थे जितनी तुम्हारी अनुपस्थिति
    चाहती हूँ प्राणपण से तुम्हारे न रहने को
    प्यार में अगर मुझे कुछ देना चाहो
    मणि-माणिक्य नहीं, लाल गुलाब भी नहीं
    तुम्हारा स्पर्श नहीं, आलिंगन भी नहीं
    चुम्बन नहीं, प्रेमिल शब्दों का उच्चारण भी नहीं
    नैकट्य नहीं, दो क्षण भी नहीं
    देना चाहो तो दो मुझे अपना न रहना .

    3.प्रेम

    यदि आंजना पड़े काजल मुझे तुम्हारे लिए
    यदि रंगने पड़ें केश मुझे तुम्हारे लिए
    देह पर लगाना पड़े इत्र
    यदि पहननी पड़े सबसे सुन्दर साड़ी
    तुम देखोगे, सिर्फ इसलिए माला-चूड़ी पहन सजना पड़े
    यदि थुलथुले पेट, गले और आँख के नीचे की झुर्रियों को ढंकना पड़े कायदे से
    तब तुम्हारे साथ और कुछ हो तो हो प्रेम नहीं है
    प्रेम होने पर मेरा जो कुछ भी है उल्टा-सीधा, सुन्दर-असुंदर, कमी-बेशी
    थोड़ी बहुत भूल, थोड़े असौंदर्य के साथ
    जब खड़ी होऊँगी सामने तुम्हारे
    तुम मुझे करोगे
    प्यार .

    4.एक दिन आएगा

    मैं तुम्हारे घर लौटने की प्रतीक्षा करुँगी
    कि तुम्हारे लिए चाय बना दूँ
    रख दूँ स्नानघर में तौलिया
    स्नान के बाद पहनने के कपड़े भी रख दूँ
    टॉयलेट सीट जो तुमने उठा छोड़ दी होगी
    उसे नीचे गिरा दूंगी
    भूल जाओ यदि फ्लश करना
    मैं फ्लश कर दूंगी
    मेज सजा रखूंगी तुम्हारे पसंदीदा व्यंजनों से
    तुम खाओगे, परोस दूंगी तुम्हारी थाल में दोहरावन
    खाओगे तुम जितना, ख़ुशी होगी मुझे उतनी
    खाते -खाते ही तुम बताओगे कि आज क्या-क्या हुआ, तुम गए कहाँ -कहाँ
    धन्य होती रहूंगी मैं सुन-सुनकर
    तुम अपना तो समझ रहे हो मुझे
    कर रहे हो प्यार
    प्यार कर रहे हो इसीलिए तो अपना समझ रहे हो
    धन्य होती रहूंगी जब तुम मुझे छुओगे
    क्योंकि किसी और शरीर को नहीं
    बल्कि प्यार कर रहे हो मेरे शरीर को
    प्रेम कर रहे हो इसीलिए तो मुझे छू रहे हो .
    तुम्हें ज्वर होने पर हो उठूंगी मैं पृथ्वी की श्रेष्ठ परिचारिका
    बुला लाऊंगी डाक्टर, जागती रहूंगी सारी रात
    माथे पर पानी की पट्टी दूंगी, शरीर पोंछ दूंगी
    घड़ी देखकर खिलाऊँगी दवा-पथ्य
    मुझे बुखार होने पर
    तुम कहोगे मौसम बदल रहा है
    खांसी होने पर कहोगे ‘यह एलर्जी है ‘
    पेट-दर्द होने पर कहोगे- क्या अंट-शंट खा लेती हो तुम?
    पीठ-दर्द होने पर कहोगे- इसी उम्र में यह सब ?
    घुटने में दर्द होने पर कहोगे रोग का अखाड़ा बन गयी हूँ मैं
    सिर-दर्द होने पर कह उठोगे- अरे वो कुछ नहीं है चला जाएगा अपने-आप
    दो-एक बाल पकने पर कहोगे- तुम्हारी असल उम्र क्या है- बताओ तो ज़रा!
    मुझे श्वास कष्ट होने पर बोलोगे ‘तुम्हारी अपनी लापरवाही से ही हो रहा है श्वास कष्ट’
    एक दिन मुझे पहाड़ घूमने की इच्छा होगी
    तुम बोलोगे-मुझे समय नहीं है
    मैं कहूँगी-मेरे पास है
    जाऊं ?
    तुम अकेली जाना चाहती हो ?
    हँस कर बोल उठूंगी- हाँ अकेली ही जाऊँगी
    तुम अट्टहास कर उठोगे सुनते ही
    बोलोगे ‘पागल हुई हो तुम!मेरी देखभाल कौन करेगा ?
    मेरा खाना कौन बनाएगा
    खाना परोस खिलायेगा कौन ?
    मेरे कपड़े कौन धोएगा
    कपड़े तह कर रखेगा कौन ?
    मेरा घर -द्वार ,बिस्तर सामान साफ़ करेगा कौन ?
    घर की रखवाली करेगा कौन ?
    पानी देगा कौन बगीचे में
    कह उठूँगी मैं
    ‘तुम’
    चढ़ जायेंगी तुम्हारी त्योरियां
    संभल कर कह उठूँगी मैं
    ‘तुम्हारी नौकरानी करेगी’
    तुम कहोगे
    नौकरानी का बनाया खाना पसंद नहीं आता मुझे
    तुम जिस अपनापे से करती हो सब कुछ
    वैसा नौकरानी तो नहीं करती न.
    मैं हँस पडूँगी
    फव्वारा फूट पड़ेगा आतंरिक सुख का
    क्योंकि नौकरानी के बनाये खाने से मेरे भोजन को अच्छा बताया है तुमने .
    मैं जो दासी नहीं, दासी से अलग हूँ
    ये गृहस्थी जो दासी की नहीं, मेरी है
    मन-मयूर नाच उठेगा मेरा इस स्वीकृति से तुम्हारी
    एक दिन समंदर देखने जाने की इच्छा से मैं सजाऊँगी
    अपना सूटकेस
    देखते ही हरिण पर अचानक झपटते लकड़बग्घे की तरह मुझपर झपट पड़ोगे
    मुझको चींथते रहोगे
    कर दोगे लहूलुहान
    रक्त देख कर आत्मीय -मित्र कहेंगे
    ये रक्त नहीं, प्रेम का प्रतीक है .
    बोलेंगे प्यार करता है तभी तो तुम्हें अपने पास चाहता है.
    दूर होकर मुझसे दो घड़ी भी जी नहीं पाओगे इसलिए मुझे चाहते हो
    मैं आँख का पानी पोंछकर हँस दूंगी
    तुम्हारी पसंद की रसमलाई बनाने को रसोई में घुसूंगी
    एक दिन मैं तुम्हें चाय बनाकर नहीं दूंगी
    चप्पल का जोड़ा पैर के आगे नहीं रखूंगी
    तुम्हारा टायलेट फ्लश नहीं करुँगी
    तुम्हारी पसंद का भोजन नहीं बनाऊँगी
    एक दिन तुम्हारी बीमारी में जागी नहीं रहूंगी
    खुद अस्वस्थ होने पर डाक्टर बुलाऊंगी
    घड़ी देखकर दवा -पथ्य खाऊँगी
    एक दिन अपने दोस्तों के साथ ढेर -सा समय बिताऊंगी
    एक दिन ऐसा होगा कि पहाड़ देखने की चाहत होने पर पहाड़ घूम आऊँगी,
    समंदर में नहाने की चाहत होने पर नहा आऊँगी समंदर में एक दिन!

    5.बेड़ी

    समूची देह को
    मुझे ढंके हुए लेटी है
    मृत्यु
    ले रही है सांस मृत्यु
    सुन पा रही हूँ मैं
    सो रही है मृत्यु
    नींद से उठ जा रही है
    कर रही है तहस -नहस बागीचे को
    सुन पा रही हूँ
    थे जितने गुलाब
    तोड़े डाल रही है
    सुन पा रही हूँ
    हठात बीच दोपहर या मध्य रात्रि में
    गहरे उनींदेपन के बीच
    सुन पा रही हूँ दु:स्वप्न के पैरों की थाप
    देखती हूँ उठ हड़बड़ा कर
    सांस नहीं ले रही हूँ
    फेफड़े में कोई कम्पन नहीं
    निस्पंद हैं हाथ-पैर
    रुक गया है ह्रदय
    आँखों की पुतली भाषा हीन
    सांस मैं नहीं
    मृत्यु ले रही है
    मेरी ही सुदीर्घ काया में
    रह रही है मृत्यु
    काया के भीतर मृत्यु
    बड़ी होती है तेज़ी से
    बढ़ते-बढ़ते उसने मेरी लम्बाई छू ली है
    एक दिन देखती हूँ मैं अवाक
    मृत्यु मेरे शरीर से भी दीर्घ हो चली है
    मृत्यु ने ढँक लिया है मुझे समूचा
    मेरे जीवन का विनिमय हो जाएगा मृत्यु के साथ
    मृत्यु प्रबल हो उठेगी
    और
    उसके शरीर के भीतर कहीं एक कोने में
    गुड़ीमुड़ी होकर बैठी रहूंगी मैं
    जीवन -केंचुल हाथ में लिए
    ग़लतफ़हमी में मुझे मृत्यु
    जीवन ! जीवन
    कह कर बुलाएगी .

    6.समंदर

    कितना कुछ देखा था मां ने
    जीवन में
    कितना कलह -लड़ाई
    कितनी घृणा
    दैनंदिन स्वार्थपरता
    देखना पड़ा था उसे कितना कुछ
    कितनी गाली-गलौच, कितने अपशब्द कितना लात-झाड़ू
    बस देख नहीं पाई तो समंदर
    कोई ऐसा-वैसा, छोटा- मोटा समंदर तक नहीं
    कितना कुछ सुनना पड़ता था मां को
    कितनी तुच्छता और कितना कष्ट-दुःख
    कितनी तो लज्जा से मर जाने वाली बातें
    बस सुन नहीं पाई तो सिर्फ समंदर का एक शब्द
    यदि देख पाती मां सिर्फ एक बार समंदर
    कभी देख पाती जी भर कर समंदर
    देख पाती आँख भर समंदर काश मां
    सुना है उदात्त के समक्ष वेदना
    उड़ जाती है हवा में
    डूब जाती है सोते में
    आंसू बनकर ढुलक जाती है
    अनेक वर्ष मां बची रही
    मां बची रही अनेक वर्ष
    समीप ही था समंदर .

    7.यौवन

    समूचा यौवन काट दिया मैंने एकाकी
    अकस्मात् मुझे अकेलापन लगेगा क्यों ?
    यदि लगे ऐसा तो यह मेरे मन की भूल है
    संभव है शरीर की भूल हो
    स्पर्श नहीं किया जिसको-तिसको समूचे यौवन में
    कछुए-सा खुद में सिकुड़ रहना
    कछुआ भी मुझ-से बेहतर तो नहीं जानता
    राह में आये पुरुष तो उन्हें टापते
    घुस रहती घर की चौहद्दी में
    पड़ी रहती खुद से तय की हुई दूरी पर
    लगता है हूँ- अकेली बिलकुल अकेली
    हज़ार-हज़ार वर्षों से
    कभी-कभी कौंधती है इच्छा
    निकलूँ बाहर, देखूं कुछ गड़बड़झाला
    इस भीड़ की ठेलमठाल
    धक्कमपेल में कोई हाथ पकड़ ले
    तो पकड़े
    देह से देह सटाकर कोई बैठ जाए
    तो बैठे
    अचम्भा क्या कि जी में आता है कि
    कोई ले ले चुम्बन
    तो ले
    असावधानीवश ही सही, लग जाए वक्ष पर किसी का हाथ
    तो लग जाए
    यह सब भासता है मुझे
    जबकि सच तो ये है
    अभी भी चौंक पड़ती हूँ
    किसी के नज़दीक आते ही
    चौंक चौंक ठिठकती हूँ
    किसी के करीब आते ही .
    समूचा यौवन पार कर अकेली ही
    पड़ी हुई हूँ आदतन
    एकाकी बिलकुल एकाकी
    न रहती ऐसे तो
    सोचती हूँ कि हो सकता था कि
    चींथ देते मुझे एक सौ बलात्कारी
    भूल ही जाना होता कि
    किस चिड़िया का नाम है स्वाधीनता
    नहीं तो जीना होता वह जीवन जो नहीं होता मेरा
    अपना, बिलकुल अपना जीवन
    काट दिया समूचा यौवन अकेले ही
    यह गलती मेरी नहीं है
    दोष नहीं है मेरा
    ये दोष मेरा नहीं है
    स्वप्न मेरा था नहीं यह कभी भी, किसी रोज़ !
    खड़े रहना पड़ा है मुझे धारा के विरुद्ध
    न हो तो आज ही कह दूँ यह बात
    पुरुष ही पुरुष थे चारों ओर
    मानुष न था कोई
    मानुष- मानुष कहकर अब भी
    अमावस की घनी रातों में
    पुरुषों से भरे इस वन में
    मानुष मानुष पुकारता भागता फिरता है मेरा
    अशरीर शरीर!
    मिलता है बहुत कुछ
    बस मिलता नहीं मानुष

    (तद्भव से साभार)

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