Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    विपाशा का कविता अंक: हिमाचल के साहित्यिक इतिहास की झलक

    By October 7, 2023Updated:October 7, 2023321 Comments10 Mins Read

     

    हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की पत्रिका विपाशा का ताजा अंक  (अप्रैल – अगस्त 2022) हिमाचल की हिंदी कविता पर केंद्रित है। अजेय द्वारा संपादित इस अंक को पढ़कर उसके ऊपर टिप्पणी की है युवा लेखक प्रमोद रंजन ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

     ======================


    हिमाचल प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की पत्रिका विपाशा का ताजा अंक  (अप्रैल – अगस्त 2022) ‘हिमाचल की हिंदी कविता’ पर केंद्रित है। 200 से अधिक पृष्ठों वाले इस अंक में हिमाचल प्रदेश की तीन पीढ़ियाें के 60 से अधिक कवि संकलित हैं। अंक के अतिथि संपादक अजेय हैं।

    अजेय सर्वांग कवि हैं। वे हिमाचल के दुर्गम लाहुल जिला के निवासी हैं, जो साल में छह महीने बर्फ से ढका रहता है।इस अंक को देखकर अनायास वह दिन याद आया, जब वे लाहुल से चल कर शिमला के मॉल रोड स्थित मेरे डेरे पर पहुंचे थे।
    सुबह चार बजे का वक्त था, मैं उन्हें लेने स्कैंडल प्वाईंट पहुंचा था। मौसम सर्दियों का था और वर्ष शायद  2005 था।
    वहां पहुंचने पर मालूम चला कि वे मौत से खेलते हुए आए हैं। लाहुल से निकलने के लिए बर्फ से ढंके राेहतांग दर्रे को पार करना पड़ता है। सर्दियों में वहां कोई वाहन नहीं चलता। रोहतांग के इस पार और उस पार की दुनिया एक दूसरे से बिलकुल कटी रहती है। अजेय ने भयावह बर्फीले तूफान और दरकते ग्लेशियरों के बीच ग्रामीणों की एक टोली के साथ रोहतांग दर्रा पैदल पार किया था। रोहतांग का शाब्दिक अर्थ है – लाशों का दर्रा। सर्दियों में उसे पार करने की कोशिश करने का मतलब है मौत काे दावत देना। 

    अजेय को ऐसी क्या जरूरत थी कि वे जान पर खेल कर शिमला आए? हम लोगों ने शिमला में कुछ स्थानीय कवि मित्रों की एक अनौपचारिक गोष्ठी रखी थी, उन्हें उसमें कविताएं सुनानीं थीं। सिर्फ इसलिए उन्होंने ऐसा खतरा मोल लिया था। 

    मैं देख सकता था कि अभिव्यक्ति की इच्छा उन्हें ली जा रही जान की तरह पुकारती है। उन दिनों हमारे बीच पत्रों के जरिए ईश्वर को लेकर नोंकझोंक हुआ करती थी। मैं  ईश्वर को उनकी कविता और जीवन से बाहर देखना चाहता था लेकिन उनका कहना होता था कि हिमालय के दुर्गम इलाकों में  जितनी कठिन परिस्थितियों में एक लाहुली सहस्त्राब्दियों से रहता आ रहा है, उसके लिए ईश्वर ही एकमात्र सहारा है।

    बाद के वर्षों में उनकी कविताएं पहल, तद्भव, हंस आदि समेत प्राय: सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

    विपाशा के कविता अंक पर बात करने से पहले अजेय के बारे में ये बातें एक खास कारण से बताईं हैं। ये ध्यान दिलाती हैं कि हिमाचल प्रदेश में लिखने वालों की तत्कालीन  युवा पीढ़ी में साहित्य को लेकर दुर्निवार आकर्षण था। वे भले ही ईश्वरवादी कविताएं लिखते हों, विभिन्न विचारधाराओं से अपरिचित हों, लेकिन उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ था। ऐसे ही एक कवि वहां मोहन साहिल हैं, जो एक छोटे से कस्बे ठियोग में चाय की एक छोटी दुकान चलाते हैं। वे उन दिनों भी साहित्य की दुनिया में काफी सक्रिय थे । लोग उनकी समझ का लोहा मानते थे। कुल्लू में निरंजन देव शर्मा हैं, जो दिल्ली के जेएनयू में पीएचडी में नामांकित हुए थे, लेकिन उनका मन उस अकादमिक माहौल में नहीं लगा। वे कुल्लू वापस आ गए थे और उन दिनों वहीं एक स्कूल खोल कर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। वरिष्ठ लेखकों में राजकुमार राकेश, एस आर हरनोट, तुलसी रमण और दिवंगत बद्रीसिंह भाटिया और मधुकर भारती थे। मधुकर भारती उसी ठियोग के थे, जहां के मोहन साहिल हैं। भारती जी ने  सर्जक नामक एक पत्रिका भी शुरू थी। भारती जी के आत्मीय प्रभामंडल के तले एक अनौपचारिक ‘सर्जक मंडल’ बन गया, जो 19 वीं शताब्दी के ‘भारतेंदु मंडल’ की याद दिलाता था।

    विपाशा का यह कविता केंद्रित अंक उपरोक्त दौर के लगभग दो दशक बाद प्रकाशित हुआ है। इस अंक में इन वर्षों में हिमाचल की रचनाशीलता में आया परिष्कार और वैचारिक परिपक्वता परिलक्षित होती है।

    अंक में एक विस्तृत परिचर्चा प्रकाशित है। इस परिचर्चा को व्हाट्स एप चैट के रूप में आयोजित किया गया था, जो दो महीने तक चली, जिसे बाद में लिप्यांतरित और संपादित किया गया।  इसमें अजेय, मोहन साहिल, निरंजनदेव शर्मा और मुंबई में रह रहे हिमाचल के चर्चित कवि अनूप सेठी ने आपस में बातचीत की है। बातचीत की मुद्रा आत्मचिंतन और आत्ममंथन की है। इस संक्षिप्त टिप्पणी में मैं इस परिचर्चा पर ही केंद्रित रहूंगा। इसमें हिमाचल के समकालीन साहित्य जगत की वैचारिकता अधिक स्पष्ट ढंंग से सामने आई है।

    परिचर्चा का शीर्षक है “हिमाचल प्रदेश हिंदी कविता के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ सा क्यों दिखता है?” शीर्षक ध्यान खींचता है। उन्होंने “हिंदी कविता के क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश” की बात की है, न कि “हिमाचली कविता” की। यह इन दो दशकों में आया परिवर्तन है। अन्यथा “हिमाचली कविता” कह कर उन्हें क्षेत्रबद्ध कर दिया जाता रहा है। 

    अब उन्हें पता है कि ‘हिमाचली लेखक’, ‘हिमाचली कवि’ आदि संबोधन उन्हें एक अलग कोठरी में धकेल देते रहे हैं, जिससे उन पर वृहत्तर साहित्य जगत की नजर नहीं पड़ती। वे अब अपनी अस्मिता के दायरे को विस्तृत कर रहे हैं। मानो कह रहे हों हम हिमाचली हैं, लेकिन भारतीय भी हैं और वैश्विक भी, हम हिमाचल के हिंदी कवि हैं, लेकिन भारत के हिंदी कवि भी हैं। हम स्वयं को सिर्फ ‘हिंदी कवि’ कहना चाहेंगे, हम पूरी मानवता के कवि हैं। कवि और लेखक होना स्थान ही नहीं, भाषा के बंधनों के भी पार होना है।

    परिचर्चा में  हिमाचल के साहित्यिक जगत की तुलना पड़ोसी पहाड़ी राज्य उत्तराखंड से करते हुए सवाल उठाया गया है कि उत्तराखंड ने अनेक दिग्गज हिंदी कवि दिए लेकिन हिमाचल प्रदेश ऐसा क्यों नहीं कर पाया?

    क्या उत्तराखंड से होने वाले पलायन से उपजा दुख वहां की कविता को मजबूत बनाता है? क्या उत्तराखंड की कविता राष्ट्रीय स्तर पर इसलिए दिखती है क्योंकि वहां के कुछ प्रमुख कवि मंगलेश डबराल, लीलाधर जगुड़ी आदि रोजी-रोटी के लिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बस गए और ऐसी जगहों पर आसीन रहे जहां से खुद को और अपने प्रदेश वालों को चमकाना आसान था? या, हिमाचल के पिछड़ने का कारण यहां के कवियों की आत्ममुग्धता है? क्या हिमाचल की लोकभाषाएं साहित्यिक पैमाने पर कमजोर रही हैं, इसलिए हिंदी में भी अच्छा साहित्य नहीं आ पाया? क्या आंदोलन, संघर्ष और विमर्श के अभाव ने हिमाचल प्रदेश के कवियों की कविताओं को कमजोर बनाया? ये प्रश्न परिचर्चा के प्रतिभागियों ने उठाए हैं और इनका उत्तर तलाशने के क्रम में उन्होंने हिमाचल के साहित्यिक इतिहास के संबंध में कुछ बहुत महत्वपूर्ण सूत्र साैंपे हैं।

    प्रतिभागियों ने पड़ोसी राज्य पंजाब के साहित्य से भी हिमाचल की तुलना की है। इस संदर्भ में मोहन साहिल का अवलोकन रेखांकित करने योग्य है। वे कहते हैं कि पंजाब के लोगों ने “नंगी तलवारों से हिंदू, मुसलमानों को कटते देखा। अपने ही अपनों को मार गए। इतनी उथल-पुथल के बाद वहां जो धारा बनी, वह सबसे अलग है। बहुत महीन सोच और इंसानियत से भरपूर है। पंजाब का अपना दर्द है, जो वहां की कविता में झलकता है।”

    निरंजन देव ध्यान दिलाते हैं कि विभाजन की त्रासदी तो हिमाचल ने भी भोगी थी। कुल्लू से लेकर मंडी और कांगड़ा तक मार काट हुई थी। व्यास नदी का पानी कई दिनों तक लाल रहा था। लेकिन क्या कारण है कि उसका दर्द हिमाचल की साहित्यिक रचनाओं में व्यक्त नहीं हुआ? इस पर अजेय ध्यान दिलाते हैं कि अगर कविता को देखें तो हिमाचल ही नहीं, बल्कि पूरी हिंदी कविता से विभाजन का दर्द गायब है।

    दरअसल,  कविता की संरचना  इतने उथल-पुथल वाले आख्यान को समाने वाली नहीं होती। इसलिए कविता से ऐसी उम्मीद करना ज्यादती है।  ऐसी चीजों को गद्य में ही प्रभावी ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। बल्कि उन्हें  दृश्य और श्रव्य माध्यम वाली कलाओं – फिल्म, नाटकों- आदि में अधिक सघनता से प्रस्तुत किया जा सकता है। हमें अभी हिंदी में ऐसी महान फिल्मों के आने की प्रतीक्षा है, जो ऐसे विषयों के साथ किसी उत्कृष्ट उपन्यास की तरह संपूर्णता में न्याय कर पाए। 

    मैंने अपने कुछ वर्षों (2001-2006) के हिमाचल प्रवास के दौरान दो छोटे अखबारों- सांध्य दैनिक भारतेंदु शिखर और साप्ताहिक ग्राम परिवेश- का संपादन किया था। उन अखबारों के कुछ पृष्ठों पर साहित्यिक विमर्शों से संबंधित सामग्री भी निरंतर प्रकाशित की, जिसमें देश के प्रमुख लेखकों के साथ-साथ हिमाचल के युवा लेखकों भी भागीदारी होती थी।

    यह देखकर खुशी हुई कि उपरोक्त छोटे अखबारों के अकिंचन, अल्पकालिक प्रयासों को भी हिमाचल के मित्रों ने यह कहते हुए आत्मीयता से याद किया है कि उनके प्रकाशन से पहली बार वहां के साहित्यिक माहौल में गर्मी आई।

    उस समय मैंने महसूस किया था कि हिमाचल के युवा लेखकों में दबी हुई चिंगारी थी, जो बाहर आने को आतुर थी। 

    लेकिन साथ ही मैंने यह भी महसूस किया था कि हिमाचल प्रदेश का हिंदी लेखन भारतीय समाज में व्याप्त समकालीन समस्याओं, आंदोलनों और विभिन्न विचारधाराओं से कटा हुआ है, इसलिए हिंदी का जो व्यापक साहित्यिक वर्ग है, उसके साथ ताल नहीं मिला पाता है। भाषा, शैली और प्रतीकों का चुनाव भी प्राय: पुराने ढंग का, एकरस है। नएपन और मौलिकता के लिए बहुत कम जगह है। वह धर्म, जाति और स्त्री के सवालों से बचने कोशिश करने वाला एक परंपरापालक समाज का पारंपरामूलक साहित्य था, जिसमें उर्जा की कमी थी। बाहरी दुनिया में उनका एक्पोजर भी काफी कम था। इस बात को मैंने एक टिप्पणी में लिखा भी था, जो शायद दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई थी। मित्रों से आपसी बातचीत में भी शायद ये बातें कही हों। उपरोक्त परिचर्चा में मेरी उन बातों को मित्रों ने सहमत-असहमत होते हुए उद्धृत किया है। वास्तव में, सार्थक सृजन के लिए एक दृष्टिकोण का होना आवश्यक है। बिना दृष्टिकोण के जो कुछ निरुद्देश्य सृजित होगा उसका कोई मूल्य नहीं होगा। विचारधारा एक कलाकार के लिए दृष्टिकोण के चयन के काम को आसान कर देती हैं। विचारधारा का अर्थ है, विभिन्न मुद्दों के संबध में एक खास किस्म की विश्वदृष्टि। लेकिन आवश्यक नहीं कि कलाकार किसी विचारधारा से संबद्ध हो ही। एक महान कलाकार की अपनी विश्वदृष्टि होती है। किंतु विभिन्न आंदोलनों, संघर्षों, विमर्शों में कलाकार की हिस्सेदारी और हस्तक्षेप से एक ऐसी गहमागहमी निर्मित होती है, जिससे उसके सृजन में धार आती है।  

    यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वे ही रचनाएं महान और कालजयी होती हैं जो समकालीन समस्याओं से टकरा कर अपनी प्रासंगिकता साबित कर पाती हैं।

    परिचर्चा में यह प्रश्न भी उठा है कि क्या हिमाचल के साहित्य के अलग-थलग रहने का कारण यहां की भिन्न भक्ति परंपरा है। कवि मोहन साहिल इस सवाल को उठाते हुए कहते हैं कि यहां भक्ति की धारा राम-कृष्ण से अलग रही है। प्राचीन हिमाचल में स्थानीय देवी देवताओं का अधिक प्रभाव था। उनकी इस टिप्पणी पर अजेय लहौल-स्पिति और किन्नौर की ‘शमन’ परंपराओं और महासू की बात करते हैं। यह ‘शमन’ दरअसल श्रमण परंपरा रही होगी, जिसकी बात इन दिनों बहुजन साहित्य की अवधारणा के तहत की जा रही है। 

    विपाशा के इस अंक में उपरोक्त परिचर्चा के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश के चार वरिष्ठ साहत्यकारों पद्म गुप्त अमिताभ, रेखा, केशव और तुलसी रमण के साक्षात्कार हैं। इन साक्षात्कारों में भी हिमाचल की रचनाशीलता के विभिन्न पड़ावों को समझने की कोशिश की गई है। इसमें तुलसी रमण ने ध्यान दिलाया है कि हिमाचल निर्माता कहे जाने वाले डॉ. यशवंत सिंह परमार का  जोर संपर्क भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने पर था।  लेकिन प्रदेश में लंबे समय तक विभिन्न पहाड़ी बोलियां ही साहित्य की भी भाषा थी। 1980 के दशक तक राज्य में पहाड़ी बोलियों और हिंदी का द्वंद चलता रहा। 1990 के दशक में यह द्वंद समाप्त हुआ और हिंदी लगभग एकछत्र रूप से राज करने लगी। 

    विपाशा के इस अंक में हिमाचल प्रदेश के प्रतिनिधि कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को शामिल किया गया है। इसके लिए पूर्व प्रकाशित और अप्रकाशित कविता का बंधन नहीं रखा गया है। इस कारण सभी कवियों की श्रेष्ठ रचनाएं यहां एक साथ संकलित हुई हैं। विपाशा का ऐसा ही अंक कहानी और आलोचना पर भी प्रकाशित हो तो और बेहतर होगा।

    [प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन और  तकनीक के समाजशास्त्र में है। संप्रति, असम विश्वविद्यालय के रवीन्द्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर।]

    Related Posts

    Dragon Money Сайт: Всё, что нужно знать о платформе

    June 21, 2026

    Драгон Мани Игры: Мифы и Реальность

    June 21, 2026

    Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши

    June 20, 2026
    View 321 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Dragon Money Сайт: Всё, что нужно знать о платформе
    • Драгон Мани Игры: Мифы и Реальность
    • Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши
    • Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble
    • Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.