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    सेतु प्रकाशन वार्षिकोत्सव: एक वार्षिकोत्सव

    By December 8, 202325 Comments4 Mins Read

    दिनांक 6 दिसंबर को सेतु प्रकाशन के वार्षिकोत्सव का आयोजन हुआ। प्रस्तुत है उसकी एक रपट

    ———————————————–

    6 दिसम्बर, 2023 को नयी दिल्ली के मण्डी हाउस स्थित ‘त्रिवेणी कला संगम सभागार’ में, कथाकार राजू शर्मा के नये उपन्यास ‘मतिभ्रम’ का लोकार्पण हुआ। अवसर था सेतु प्रकाशन के वार्षिकोत्सव का।

    ज्ञात हो कि ‘सेतु पाण्डुलिपि पुरस्कार योजना (2023)’ के लिए आयी सौ से भी अधिक पाण्डुलिपियों में से राजू शर्मा की पाण्डुलिपि ‘मतिभ्रम’ को पुरस्कार के लिए चुना गया।

    सेतु प्रकाशन के इस वार्षिकोत्सव समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी, ममता कालिया, कथाकार अखिलेश, आलोचक रवीन्द्र त्रिपाठी, कवि मदन कश्यप, गांधीवादी चिंतक कुमार प्रशान्त और आलोचक संजीव कुमार समेत काफी तादाद में साहित्य प्रेमियों, शोधकर्ताओं और प्राध्यापकों ने शिरकत की। कार्यक्रम का संचालन शोभा अक्षरा ने किया।

    कथाकार राजू शर्मा का अभिनंदन करते हुए अमिताभ राय ने सेतु प्रकाशन से सम्बद्ध दो पहल के बारे में बताया। पहली, बालिका शिक्षा के क्षेत्र में सेतु प्रकाशन अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेगा, और दूसरी, साहित्यकारों के हित में एक ऐसी ‘साहित्यकार निधि’ का गठन, जो साहित्यकारों के हितों के प्रति एकाग्र और सुचिंतित हो। इस साहित्यकार निधि कमिटी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी होंगे और उनके नेतृत्व में ही इस योजना को व्यावहारिक रूप दिया जाएगा।

    कार्यक्रम का आरम्भ ‘सेतु-वाग्देवी व्याख्यान’ सत्र के अन्तर्गत गांधीवादी चिंतक कुमार प्रशान्त के बीज वक्तव्य ‘गांधी की ये जो अक्षर देह है…’ से हुआ। उन्होंने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि गांधी के अक्षर एक हथियार हैं, जिसे वे अहिंसा की सीढ़ी के तौर पर देखते हैं। गांधी के अक्षर साहित्यिक अक्षरों से इन मायनों में भिन्न हैं कि वे महज अभिव्यक्ति नहीं हैं, वे कर्म की आँच में तपे हैं। गांधी के अक्षर वज्र की तरह कठोर हैं और गहरी चुनौती देते हैं। प्रशान्त जी ने सामाजिक राजनीतिक परिदृश्यों में गांधी को फिर-फिर पढ़ने की जरूरत बताई।

    कार्यक्रम के दूसरे सत्र की शुरुआत पुरस्कृत पुस्तक ‘मतिभ्रम’ के लोकार्पण से हुई। प्रो. विद्या सिन्हा ने कथाकार राजू शर्मा को ‘स्मृति चिह्न’ और ‘मानपत्र’ देकर सम्मानित किया। साथ ही सत्र के सभी वक्ताओं को भी सम्मानित किया गया।

    लोकार्पण के बाद पुरस्कृत पुस्तक पर परिचर्चा की शुरुआत करते हुए आलोचक डॉ संजीव कुमार ने कहा, राजू शर्मा हिन्दी की दुनिया में अपनी तरह के अनोखे उपन्यासकार हैं, ये उनके लेखन के मिजाज से पता चलता है। नवउदारवादी स्टेट के भीतर की साजिशों या उसके भीतर की अँधेरी जालसाज दुनिया में ‘मतिभ्रम’ उपन्यास हमें ले जाता है। जो स्टेट के दावे हैं जमीनी हकीकत उससे उलट है। दोनों के बीच के अन्तराल को इस उपन्यास में बहुत अच्छे से व्यक्त किया गया है। ‘भारत की अर्थव्यवस्था अमीरों के पक्ष में गहरी दुर्भिसन्धि का शिकार है’ इस उपन्यास में यह बात साबित होती है।

    वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने कहा कि राजू शर्मा ने हमारे समय की विसंगतियों और विडम्बनाओं को सामने रखा है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण है, उन्होंने नौकरशाही के अपने अनुभवों को प्रामाणिक तरीके से इस उपन्यास में उकेरा है।

    तद्भव पत्रिका के सम्पादक व कथाकार अखिलेश ने पुस्तक परिचर्चा में कहा कि राजू शर्मा एक अनोखे किस्सागो हैं। नये किस्म का जादू है उनके कथ्य में। यथार्थ का विस्तार है। राजू शर्मा के कथा संसार में एक शक्ति संरचना है, नौकरशाह होने की वजह से जो माहौल उनके आसपास रहा वो उनके उपन्यासों में भी प्रतिबिम्बित होता दिखता है। राजू शर्मा की तरह लिखने का साहस हर किसी में नहीं है।

    आलोचक रवीन्द्र त्रिपाठी ने डिस्टोपिया की चर्चा करते हुए कहा कि राजू शर्मा का नया उपन्यास ‘मतिभ्रम’ दु:स्वप्न की कथा है। इस उपन्यास के बहाने अखिलेश ने जॉर्ज आरवेल के ‘1984’ और श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का भी जिक्र किया।

    द्वितीय सेतु पाण्डुलिपि पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार राजू शर्मा ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि पिछले करीब एक दशक में राष्ट्र के नाम पर जो तरह-तरह के नैरेटिव गढ़े और प्रचारित किये गये हैं वे बहुत खतरनाक हैं। हमें इस सब के प्रति सचेत होना होगा।

    वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने सम्मानित कृति का जिक्र करते हुए कहा कि लेखक ने बड़े ही धारदार तरीके से अफसरशाही की कठोरता और निरुपायता दोनों को चित्रित किया है। यह उपन्यास दरअसल नौकरशाही में आने का मतिभ्रम भी है, जहाँ व्यक्ति कहने को एकदम स्वतन्त्र और ताकतवर हो जाता है। जबकि ईमानदारी से काम करने पर उसको दमन झेलना पड़ता है। वह विसंगतियों में रहता है और ‘मतिभ्रम’  उसी अनुभव की कथा है।

    कार्यक्रम का समापन सेतु प्रकाशन समूह की प्रबन्धक अमिता पाण्डेय के वक्तव्य से हुआ। उन्होंने सेतु प्रकाशन की स्थापना से अब तक, पिछले पाँच साल की प्रगति तथा ‘सेतु’ के उद्देश्यों व प्रतिबद्धताओं के बारे में बताते हुए सभी वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

    – स्मिता सिन्हा

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