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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    मैं मनुष्य ही बने रहना चाहता हूँ- विश्वनाथ त्रिपाठी

    By March 22, 2011Updated:August 17, 2020858 Comments9 Mins Read
    चित्र साभार: शब्दांकन
    हाल में ही प्रसिद्ध आलोचक, लेखक और सबसे बढ़कर एक बेजोड़ अध्यापकविश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने जीवन के 80 साल पूरे कर लिए. लेकिन अभी भी वे भरपूर ऊर्जा से सृजनरत हैं. अभी हाल में ही उनकी किताब आई है ‘व्योमकेश दरवेश‘, जो हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन-कर्म पर है. उनसे बातचीत की युवा लेखक शशिभूषण द्विवेदी ने- जानकी पुल.
    ==========================================================
    प्रश्न- त्रिपाठी जी, कहते हैं कि जब आदमी बहत्तर साल का हो जाता है तो देवता हो जाता है, अब आप तो अस्सी के हो गए हैं। क्या लगता है देवता हो गए हैं या अभी तक मनुष्य ही हैं?

    विश्वनाथ त्रिपाठी– यह बात मेरे गुरुजी हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने ‘अनामदास का पोथा’ में लिखी है कि बहत्तर साल का आदमी देवता हो जाता है। पंडितजी संस्कृत, ज्योतिष और तंत्र के भी विद्वान थे, उन्होंने ऐसा लिखा है तो संभव है कि परंपरा में ऐसी कोई बात रही हो। लेकिन मेरी समझ से यह बात उन्होंने व्यंग्य में लिखी थी। अब बहत्तर साल का रिटायर्ड आदमी किसी काम का तो रह नहीं जाता, इंद्रिया जवाब दे जाती हैं, जो जीना-भोगना होता है, जी-भोग लिया होता है। अब उसे पड़े-पड़े भगवद्-भजन के अलावा क्या करना है। तो ऐसे आदमी को देवता कहो या जो कहो। रही मेरी बात तो मैं मनुष्य ही बना हुआ हूं और वही बना रहना चाहता हूं।
    प्रश्न- हाल ही में हजारी प्रसाद जी पर आपकी बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक आई है-व्योमकेश दरवेश। हजारी प्रसाद जी आपके गुरु भी थे। इसे लिखकर क्या आप गुरुऋण से उऋण हो गए?

    विश्वनाथ त्रिपाठी– –इस पुस्तक को लिखने की इच्छा मेरी बहुत पहले से थी लेकिन कभी हिम्मत नहीं कर पाता था। एक तो पंडितजी का व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उन पर लिखते हुए हमेशा डरता था कि न्याय कर पाऊंगा या नहीं। सबसे पहले इसे लिखने की इच्छा मैंने भीष्म साहनी के सामने जाहिर की थी। अज्ञेय और भीष्म साहनी के बड़े भाई बलराज साहनी पंडितजी के साथ काम कर चुके थे। फिर पंडितजी के न रहने पर मुझे उनकी याद बहुत सताती थी। उनके साथ मेरा तेईस साल लंबा साथ था। उनके परिवार की भी मुझ पर बहुत कृपा रही। छात्र जीवन में जब मैं उनके संपर्क में आया तो बहुत साधनहीन था। बहुत कम लोगों ने अपने छात्र जीवन में उतने उपवास किए होंगे जितने मुझे करने पड़े। कानपुर से बीए किया। वहां सिनेमा देखने का चस्का लग गया था। सो किसी तरह सेंकंड डिवीजन में पास हुआ। बड़ा दु:खी हुआ और भागकर पंडितजी की शरण में आ गया। पंडितजी के बारे में बहुत सुना था। उनके पास गया तो भक्तिभाव में था, मगर उन्होंने कहा कि तुम्हें क्या पता कि मुझमें कितने दोष हैं। खैर…पंडितजी जानते थे कि भूख आदमी की अनिवार्य जरूरत है। उन्होंने खुद बहुत गरीबी देखी थी। उनके पास जाने पर वे हमेशा पूछते थे कि भोजन किया है या नहीं। भूखे तो नहीं हो। यह बात उनकी सर्जना में भी दिखाई देती है। पंडितजी शास्त्रज्ञ पंडित थे लेकिन साधारण मनुष्य के सुख-दु:ख और उनके जीवन में उनकी बहुत रुचि थी। दलित, वंचित और अभावग्रस्त मनुष्य को लेकर उनके मन में बहुत करुणा थी। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अस्पृश्य के संदर्भ में दलित शब्द का प्रयोग किया। पंडितजी परंपरा से जुड़े विद्वान थे लेकिन उनका दृष्टिकोण संकीर्णतारहित था। उनका मानना था कि हिंदी कोई अकेली भाषा नहीं है, वह अखिल भारतीय भाषाओं से जुड़ी है। उसका एक कांटा काशी में है तो दूसरा भुवनेश्वर में और तीसरा केरल में। इस तरह ये चीज उनके साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से जुड़ती है। हिंदी क्षेत्रों में तो लोग हिंदी के नाम पर तमाम कर्मकांड करते रहते हैं लेकिन पंडित जी ने शांतिनिकेतन में एक बांग्लाभाषी क्षेत्र में पहली बार हिंदी भवन बनवाया। वे कहते थे कि हिंदी राष्ट्रभाषा है या नहीं, यह सोचना हिंदी वालों का काम नहीं है। इस बारे में दूसरे लोग सोचें। हमारे लिए तो हिंदी मातृभाषा है।

    पंडितजी किसी तरह के कर्मकांड में विश्वास नहीं करते थे। वे अकादमिक दुनिया में और अकादमिक दुनिया में भी तमाम तरह के कर्मकांड होते हैं जो पंडितजी को नहीं आते थे इसलिए इस दुनिया में वे हमेशा ही अनफिट रहे। उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय छोडऩा पड़ा तब भी कुछ ऐसी ही स्थितियां थीं। उनके विरोधी बहुत हो गए थे। उन्होंने विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में मीरा पर पद्मावती ‘शबनम’ की किताब की जगह परशुराम चतुर्वेदी की किताब लगवा दी थी। बेशक परशुराम चतुर्वेदी की किताब पद्मावती शबनम की किताब से लाख गुना बेहतर थी लेकिन जिस तरह अकादमिक कर्मकांडों को ताक पर रखकर पंडितजी ने उसे पाठ्यक्रम में लगवाया वह बहुत से लोगों को हजम नहीं हुआ और उनका बहुत विरोध हुआ। आखिरकार पंडितजी को विश्वविद्यालय से हटना पड़ा। लेकिन पंडितजी का सम्मान बहुत था। काशी विश्वविद्यालय से हटते ही उन्हें चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से बुलावा आ गया। चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में उनकी जगह प्रोफेसर पद के जो उम्मीदवार थे इंद्रनाथ मदान उन्होंने पंडितजी के कारण अपना नाम वापस ले लिया यह कहकर कि प्रोफेसर बनने से अच्छा है कि पंडितजी के अधीन रहकर रीडर बने रहना। तो पंडितजी का सम्मान तो बहुत था लेकिन अकादमिक कर्मकांड में वे कभी फिट नहीं हो पाए। खैर…

    तो पंडितजी को मैं जानना चाहता था। जिसके प्रति आपका लगाव होता है उसे आप जानना चाहते हैं। उनके प्रति एक जिज्ञासा थी। श्रद्धा में भी एक जिज्ञासा होती है जैसे प्रेम में होती है। तो उसी जिज्ञासा यानी जानने की प्रक्रिया में यह किताब लिखी गई। लिखना जानने की ही प्रक्रिया है। यही ज्ञान है, गुणकथन है, कीर्तन है। यही कविता है। तो यह एक ही प्रक्रिया के विभिन्न आयाम हैं। फार्म के स्तर पर यह किताब पंडितजी की जीवनी है लेकिन वस्तुत: यह संस्मरणात्मक जीवनी है। चूंकि पंडितजी के प्रति मेरी इतनी श्रद्धा रही है कि उन्हें लेकर मैं तटस्थ रह ही नहीं सकता इसलिए अपनी अक्षमता का मुझे बोध भी है। पंडितजी पर जैसी किताब लिखी जानी चाहिए वह तो बहुत मुश्किल है। हालांकि इस किताब को लिखने को लेकर किसी तरह के नैतिक दायित्व का भाव मुझमें नहीं रहा, बस मैं इसे लिखे बिना रह नहीं सकता था। यह एक तरह से मेरे अस्तित्व की मांग थी। इसे लिखवाने में नामवर जी और नित्यानंद तिवारी की बड़ी भूमिका रही है। मेरे लेखन पर नामवर जी का बहुत असर रहा है। पंडितजी पर किताब लिखने का पहला हक तो नामवर जी का ही था। किन्हीं कारणों से वे नहीं लिख पा रहे हैं, यह अलग बात है। फिर भी उन्होंने पंडितजी पर जो लिखा है- ‘दूसरी परंपरा की खोज’ वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसने मुझे बहुत प्रेरित किया। इस तरह इस किताब को लिखने का बहुत बड़ा श्रेय नामवर सिंह को ही जाता है। पंडितजी के बारे में बहुत सी बातें मुझे उन्हीं से पता चलीं।
    प्रश्न- जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में बिताने के बाद नंगातलाई के बिसनाथ को क्या अब कभी अपना गांव याद आता है?

    विश्वनाथ त्रिपाठी– हां, वो सारी चीजें तो मेरे रक्त में डूबी हुई हैं। नंगातलाई का गांव में वो सारी चीजें आई हैं। जब मां की गोद में दूध पीता था वो अनुभव..एक अलग और अनोखे जैविक अध्यात्म का अनुभव है। मेरी मां तब लगभग किशोरी थीं। चांदनी रात में मां का दूध पीने की स्मृति जिसमें सिर्फ मां का दूध ही नहीं उसके शरीर की गंध और वात्सल्य भी पी रहा होता था। पहले प्रेम का अनुभव जो कभी कहा नहीं जा सका। पहला चुंबन जिसका बिंब निराला की एक कविता में आता है- अधरों का रस पीती, कंठ लगी उरगी…। वो सारी चीजें अब भी बहुत हांट करती हैं। गांव के लोग, लक्खा बुआ, नेपाल, माने, जनकदुलारी..सबके किस्से नंगातलाई का गांव में आए हैं। वो सब अब भी बहुत याद आते हैं।
    प्रश्न- आगे क्या कुछ लिखना चाहते हैं जो छूट गया हो?

    विश्वनाथ त्रिपाठी– मेरी बहुत इच्छा है कि मैं अपने गांव के दलितों और वेश्याओं पर लिखूं। वहां बेडि़नियों के जीवन पर। स्वास्थ्य ठीक रहा तो चाहता हूं कि गांव जाकर कुछ महीने रहूं और इस पर लिखूं कि गांव कैसे बदल गया है। आज का गांव प्रेमचंद का गांव नहीं है। वैसा रोमांटिसिज्म, शोषण-अत्याचार का वो रूप भी वो नहीं है। जाति प्रथा तेजी से मिट रही है। दलितों के जीवन में एक नया सवेरा आ रहा है। इस तरह दलितों के जीवन में खुशी और उल्लास का नया तत्व आया है, मैं उस पर लिखना चाहता हूं। फिर अपने शिष्यों पर मैंने संस्मरण लिखे थे। उसमें कुछ चीजें रह गई हैं उन्हें लिखना चाहता हूं। इसके अलावा कहानी पर एक सैद्धांतिक किताब लिखना चाहता हूं। लेकिन फिलहाल यह किताब लिख ली है। अब कुछ दिन आराम करना चाहता हूं।
    प्रश्न- साहित्य के अलावा संगीत में भी आपकी गहरी रुचि है। उसके बारे में कुछ बताएं?

    विश्वनाथ त्रिपाठी– मैं शास्त्रीय संगीत बहुत सुनता हूं। भीमसेन जोशी का शुद्ध कल्याण मुझे बहुत प्रिय है। उनका गाया ‘तुम बिन कौन ले खबरिया…’ मुझे अक्सर बहुतभावविभोर कर देता है। उनके स्वर में जो एक पवित्र याचना है वो और कहीं नहीं मिलती। संगीत में थोड़ी बहुत रुचि छात्र जीवन से ही थी। रुइया हास्टल में रहकर जब पढ़ता था तो वहीं पास में म्यूजिक कॉलेज था जिसके प्रिंसिपल थे ओंकारनाथ ठाकुर। उनके पास हम लोग जाया करते थे। शास्त्रीय संगीत में रुचि उन्हीं के कारण हुई। भीमसेन जोशी के संगीत से मेरा पहले-पहल परिचय मेरे एक साथी सान्याल ने कराया था। एक शाम उसने मुझसे कहा कि चलो तुम्हें शास्त्रीय संगीत सुनना सिखाता हूं। मैं उसके साथ हो लिया। उसके कमरे पर जाकर हम लोगों ने शराब पी। फिर उसने भीमसेन जोशी का शुद्ध कल्याण बजाया और कमरे की सारी बत्ती बुझा दी। अचानक मुझे लगा कि आंखों के आगे तमाम बिंब उभरने लगे हैं। यह एक अलग तरह का आध्यात्मिक अनुभव था। एक बात जान लो, कविता की तरह संगीत में भी भाव होते हैं, बल्कि संगीत हमारी भावनाओं का ही स्वरनाट्य है। दरअसल, सत्य शब्दों में नहीं होता, स्वर में होता है। बच्चा जब मां से कुछ मांगता है तो स्वर में ही मांगता है। यह स्वर प्रकृति में है। कविता तो उन्हें पकडऩे का प्रयास भर करती है। यहीं कला का सौंदर्य है। सौंदर्य का कोई उद्देश्य नहीं होता। सौंदर्य का उद्देश्य सिर्फ सौंदर्य होता है। इस तरह कला की साधना एक तरह से दैवीय साधना भी है। लेकिन मैं यहां कहना चाहता हूं कि आज ग्लोबल मार्केट के दौर में कला का यह सौंदर्य बर्बाद हुआ है क्योंकि वहां सौंदर्येतर उद्देश्य हैं। यह बात मुझे बहुत पीड़ा देती है।
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